प्रेमाश्रु-वर्षण-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 1

प्रेमाश्रु-वर्षण-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 1

 सखी री मोरा बोलन लागे

सखी री मोरा बोलन लागे।
मनु पावस कों टेरि बोलावत, तासों अति अनुरागे।
किधौं स्याम-घन देखि देखि कै, नाचि रहे मद पागे।
‘हरीचंद’ बृजचंद पिया तुम आइ मिलौ बड़-भागे॥

 देखि सखि चंदा उदय भयो

देखि सखि चंदा उदय भयो।
कबहूँ प्रगट लखात कबहुँ बदरी की ओट भयो।
करत प्रकास कबहुँ कुंजन में छन-छ्न छिपि-छिपि जाय।
मनु प्यारी मुख-चंद देखि के घूँघट करत लजाय।
अहो अलौकिक वह रितु-सोभा कछु बरनी नहिं जात।
‘हरीचंद’ हरि सों मिलिबे कों मन मेरो ललचात॥

 सखी अब आनंद को रितु ऐहै

सखी अब आनंद को रितु ऐहै।
बहु दिन ग्रीसम तप्यो सखी री सब तन-ताप नसैहै।
ऐ हैं री झुकि के बादर अरु चलिहैं सीतल पौन।
कोयलि कुहुकि कुहुकि बोलैंगीं बैठि कुंज के भौन।
बोलैंगे पपिहा पिउ-पिउ बन अरु बोलैंगे मोर।
‘हरीचंद’ यह रितु छबि लखि कै मिलिहैं नंदकिसोर॥

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