प्रीत सदा ही गाता हूँ…-कविता -संजीव कुमार दुबे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanjeev Kumar Dubey 

प्रीत सदा ही गाता हूँ…-कविता -संजीव कुमार दुबे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanjeev Kumar Dubey

 

मैं गीत कभी ही लिखता हूं, पर प्रीत सदा ही लिखता हूँ,
दर्दों को भी अजमाता हूं, पर प्रीत सदा ही गाता हूँ।
ताने मारो या पुचकारो, चाहे जितना भी धिक्कारो,
जो देता स्पर्श प्रेम का, उसका ही हो जाता हूँ। पर प्रीत सदा ही—–।

बचपन यूँ ही ठीक चला, यौवन होता ही छिछला,
मांसल सुन्दरता देखी, तब तब बार बार फिसला,
झूठे ही चाहे ऑंख मिली, उसको ही मीत समझ बैठा,
अधरों की उज्ज्वल मुस्कानों पर, यूँ ही अपना दिल दे बैठा।
उन खट्टी मीठी यादों पर, अब भी मैं इतराता हूँ। जो देता स्पर्श—

फिर यौवन और बढा, और दुनियां में बाहर निकला,
कितने जाने अनजानों से, अनायास ही घुला मिला,
कभी नर्म सी आहट से, बस दूर दिलों में बात हुई,
पता ही नहीं हुआ हमको, कब दिवस हुआ कब रात हुई।
उन स्वपनीले लम्हों को, अब भी मैं झुठलाता हूँ।जो देता स्पर्श—–

फिर प्रकृति सौंदर्य का बोध हुआ, और भ्रमण का योग हुआ,
आसमान पर जा बैठा, इतना सुन्दर संयोग हुआ,
तैर रहा था बहुत दिनों तक, शीतल मदिर हवाओं में,
ईश्वर की महती कृपादृष्टि, और अपनों की भरपूर दुआओं में।
अब उन यादों को बस, झूलों में झुलबाता हूँ।जो देता स्पर्श——

अब आ पहुंचा हूं, जीवन के खुदरे समतल में,
नयी प्रीत की डगर खोजता, दर्दों में और हलचल में,
दर्दो के रूप, गरीबी भूख अशिक्षा बीमारी
झोपडियों की आर्तदृष्टि, और सपनों की लाचारी।
खुद को जोड़ न पाया इनसे, कितना मैं पछताता हूँ।जो देता स्पर्श–

अब जी करता है, जुड़ जाऊँ उन झोपड़ियों मे,
समझ सकूँ वह पीर, छोटी बिटिया की गूदड़िओं में,
बूढे बाबा के हुक्कों में, अम्मा की मूंदड़ियों में,
खिल न सके जहाँ मूल फूल, उन सूखी फुलबड़ियों में।
ऐसा यदि हो जाये, यह सोचकर ही खिल जाता हूँ।जो देता स्पर्श–

अ, आ, इ, ई वर्णाक्षर, उन बच्चों को सिखलाऊँ मैं,
गोला बनवाकर घूम घूम कर, गिनती का गीत गवाऊँ मैं,
खेल खेल में पहाड़े को, बार बार रटवाऊं मैं,
तुम ही तो हो कल के भविष्य, यह गीतों से समझाऊँ मैं
देकर खड्डी कलम, कभी इमला कभी सुलेख बन जाता हूँ।जो देता स्पर्श—

इन गलियों के नौनिहाल भी, बनें शिखर उद्बोधन,
ऊँची ऊँची प्राचीरों से, करें राष्ट्र सम्बोधन,
बिखरी वगियाओं के फूलों से, करें राष्ट्र संयोजन,
खुशबू बनकर फैल जायें, दिक दिक अगणित योजन।
उन फूलों की माला का, मैं धागा बन जाता हूँ।
जो देता स्पर्श प्रेम का उसका ही हो जाता हूँ।

 

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