प्रीतम जानि लेहु मन माही- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

प्रीतम जानि लेहु मन माही- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥
अपने सुख सिउ ही जगु फांधिओ को काहू को नाही ॥1॥रहाउ॥
सुख मै आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहू दिसि घेरै ॥
बिपति परी सभ ही संगु छाडित कोऊ न आवत नेरै ॥1॥
घर की नारि बहुतु हितु जा सिउ सदा रहत संगि लागी ॥
जब ही हंस तजी इह कांइआ प्रेत प्रेत करि भागी ॥2॥
इह बिधि को बिउहारु बनिओ है जा सिउ नेहु लगाइओ ॥
अंत बार नानक बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥3॥12॥139॥634॥

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