प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता?

वैसे तो तुम कभी न आते,
पर जब सपनों में आ जाते,
मुझे वहां भी छलते हो तुम,
क्या सपनों से भी बढ़कर है मानव-जीवन की असत्यता!
प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता?

माना हूं मैं मानव लघु ही,
और मधुर तुम देव ही सही,
प्यार न यदि मुझको करते हो,
तृण समान ठुकरा सकते हो;
क्या जड़ तृण से भी बढ़कर है इस जग के मानव की लघुता !
प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता?

पत्राश्रित निशि-तुहिन-बिन्दु चल-
मैँ मुसकाते तुम नित चंचल
मैंने इतना ही मांगा पर,
बन जाओ मेरे कवि के स्वर,
यह इच्छा भी तो न पूर्ण की;
क्या निशाश्रु से कम कोमल है इस युग के मानव की कविता !
प्रियतम ! क्यों इतनी निष्ठुरता?

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