प्रार्थना-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

प्रार्थना-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा,
दूर मंजिल हमारी बिखर जाऊँगा।

जिन्दगी के भँवर से निकलना मुझे,
बंदगी जिसमें तेरी, वो करना मुझे,
तेरी दृष्टि पड़ी तो निखर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।

तेज धारा नदी की न पतवार है,
डूब जाएगी नैया, भी आसार है,
कर दो कृपा तो मैं तर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।

जाति, धरम की है चलती हवा,
निर्धन को मुश्किल से मिलती दवा,
तेरे दर से न खाली मैं घर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।

अंधियारी रातों में जलता है घर,
हिंसा की आँधी है, उजड़ा शहर,
चरणों में नव पुष्प धर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।

नदियों में बहता है पानी बहुत,
सूखी धरा की कहानी बहुत,
प्यासा हूँ, प्यासे ही मर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।

गुलज़ार कर दे तू उजड़ा चमन,
सारी मही और सारा गगन,
श्रद्धा से दर तेरा भर जाऊँगा।
बिन सहारे प्रभु मैं किधर जाऊँगा।
दूर मंजिल हमारी बिखर जाऊँगा।

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