प्रातःकाल-बोरिस पास्तरनाक-देशान्तर-धर्मवीर भारती-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

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तुम मेरी नियति थीं, सब कुछ
और फिर आया युद्ध, विध्वंस
और कितने-कितने दिनों तक
न तुम्हारा अता-पता, न कोई खबर
इतने दिनों बाद
फिर तुम्हारी आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया है
रात भर मैं तुम्हारा अभिलेख पढता रहा हूँ
महसूस हुआ जैसे कोई मूर्छा टूट रही हो
मैं चाहता हूँ लोगों से मिलना, भीड़ में,
भीड़ की प्रातःकालीन हलचल में-
मैं चाहता हूँ हर चीज़ की धज्जियाँ उड़ा देना
ताकि वे घुटने टेक दें
और मैं सीढ़ियों से नीचे दौड जाता हूँ
गोया उतर रहा हूँ पहली बार
उन बर्फानी सड़कों में
उनके सुनसान फुटपाथों पर
चारों ओर बत्तियों की रौशनी है,
घरेलूपन है, लोग जाग रहे हैं
चाय पी रहे हैं, ट्राम पकड़ने दौड़ रहे हैं
बस महज चंद मिनट और
कि शहर की शक्ल बदल जायेगी
बर्फीला अंधड एक जाल बुन रहा है
घनघोर गिरते बर्फ का जाल, फाटक के पार
लोग वक्त पर पहुँचने की हड़बड़ी में
अधूरी थाल, अधूरी चाय छोड़ते हुए
मेरा मन उनमें से एक-एक की ओर से महसूस करता है
गोया मैं उनकी काया में जी रहा होऊं
पिघलते बर्फ के साथ पिघलता हूँ मैं
सुबह के साथ मैं तेज पड़ने लगता हूँ
मुझमें हैं लोग- अज्ञातनाम लोग-
बच्चे, अपने घर में तमाम उम्र गुज़ार देने वाले लोग, वृक्ष
मैं उन सबके द्वारा जीत लिया गया हूँ
यही मेरी एकमात्र जीत है

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