प्रश्न-देखना एक दिन-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

प्रश्न-देखना एक दिन-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

जब-जब भी बाँधना चाहा
जीवन को भाषा में
(तात्पर्य सत्य को)
वह हँसा–
तुम मुझे बाँधना चाहते हो
भाषा की मेड़ से,
सकोगे बाँध
बाढ़ को?

अच्छा–
तुम इतना ही बता दो
वह कौन है
(या कौन-कौन हैं)
जिसे तुम बारम्बार
अपनी कविताओं में सम्बोधित करते हो,
क्या है उस सर्वनाम ‘‘तुम’’ की वास्तविक संज्ञा?
नहीं बता सकते न?
और चले हो
जीवन को भाषा में बाँधने
क्या नहीं है यह प्रवंचना?
स्वत्त्व पर से कवच-कुण्डल
चीर कर उतारने जैसा है
भाषा में जीवन को बाँधना–
(तात्पर्य सत्य को)।
बन सकते हो
ऐसे निर्भय या निर्विकार?

 

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