प्रश्न-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

प्रश्न-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

जल! तुम कब बनोगे नदी?
इन कान्तारी काँठों के पत्थरों पर
जो लिखी पड़ी है
क्या वह नदी है?
नहीं, वह तो नदी-पथ है
नदी की देह है
नदी कहाँ?

भ्रम है नदी का–
कगारों को ही नहीं
टिटहरियों को भी
तभी तो
नदी-पथ में नदी को ढूँढ़ते
पुकारों के वृत्त में वे उड़ रही हैं।

कगारों से उतरता
वह मार्ग
घुटनों तक उठाये वस्त्र
पार करता नदी जैसा लग रहा है।
धूप भी तो
नदी-पथ में उगी इन झरबेरियों में
अनमनी सी, रोज कैसे खोजती है, नदी।

हवाएँ, चील जैसी मारकर लम्बे झपट्टे
हार-थक तब बैठ जाती हैं
किसी पीपल तले।

पर यह विवश आकाश
जाए तो कहाँ जाए?
कैसा निष्पलक
है प्रतीक्षारत
क्षितिज से क्षितिज तक दिन-रात–

ओ-जल! तुम कब बनोगे नदी?

 

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