प्रश्नों की परछाइयाँ-राजकुमार जैन राजन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajkumar Jain Rajan

प्रश्नों की परछाइयाँ-राजकुमार जैन राजन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajkumar Jain Rajan

सिमटते जा रहे हैं दिल
और……
जज्बातों के रिश्ते
जिनके परिभाषित हो जाने पर
अकारण का आरंभ
असमय का अंत
दोनों ही व्यर्थ हो जाते हैं
सौदा करने में जो माहिर है
बस वही कामयाब है

हमारे आस- पास भटकते
शब्दों के बादल
टेडी – मेडी आकृतियों से
बिछ जाते हैं
मरुस्थली सन्नाटों में
मुझ तक आकर लौट जाता है
तब-
प्यार का लहराता समुद्र

अपनी अतल गहराइयों के साथ
द्वेष का दावानल थामें
प्रश्नों की परछाइयाँ
पांवों में लिपट जाती है
एक बेसहारा, कमजोर
लता की तरह
हवा के हर प्रहार से
झुक जाती है
कभी टूट जाती है
कितना कठिन है
उन हालात से पार पाना

विवशता की ये चरम सीमा
भले ही भीतर तक
तोड़ना चाहती है
गाहे-ब-गाहे
जीवन के खेल में
पराजित भी कर जाती है
जाते-जाते कितने प्रश्न
उछाल जाती है
विचलित से इस संसार में
इंसान को जूझना और जीतना भी
सिखा ही जाती है।

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