प्रवेश-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand) 

प्रवेश-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand)

 

प्रवेश

जिस लेखनी ने है लिखा उत्कर्ष भारतवर्ष का,
लिखने चली अब हाल वह उसके अमित अपकर्ष का ।
जो कोकिला नन्दन – विपिन में प्रेम से गाती रही ,,
दावाग्नि-दग्धारण्य में रोने चली है अब वही !!! ॥ १ ॥

 

वर्तमान भारत

यद्यपि हताहत गात में कुछ साँस अब भी आ रही,
पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही-
जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही,
था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही ॥ २ ॥

भारत, कहो तो आज तुम क्या हो वही भारत अहो !
हे पुण्यभूमि ! कहाँ गई है वह तुम्हारी श्री कहो ?
अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर-मध्य केवल पङ्क है;
वह राजराज कुबेर अबी हा ! रङ्क का भी रङ्क है ! ॥ ३ ॥

 

प्राचीन चिन्ह

प्राचीनता के चिन्ह भी क्या अब तुम्हारे रह गये ?
खंडहर खड़े हैं कुछ सही, पर आज वे भी हैं नये ।
सुनते यही हैं हाय ! हम जा पहुँचते हैं जब वहाँ-
“कोई हमें वे मत कहो, देखो न, अब हम वे कहाँ !” ॥४॥

उन मन्दिरों के ढेर ऊँचे, आद्रि-रूप, उजाड़ हैं;
हा पूर्वजों की बैठकों पर दीखते अब झाड़ हैं ।
वे झाड़ मर्मर-मिस पवन में भर रहे थे शब्द हैं-
“जो थे यहाँ उनको हुए बीते अनेकों अब्द हैं !” ॥५॥

जिन श्रेष्ठ सौंधों में सुगायक श्रुति-सुधा थे घोलते,
निशि-मध्य टीलों पर उन्हीं के आज उल्लू, बोलते ।
“सोते रहो हे हिन्दुओ ! हम मौज करते हैं यहाँ”,
प्राचीन चिन्ह विनष्ट यों किस जाति के होंगे कहाँ ?॥६॥

श्रुति, शास्त्र और पुराण का होता जहाँ प्रिय-पाठ था,
सुन्दर, सुखद, शुचि सत्त्व गुण का एक अद्भुत ठाठ था ।
जम्बुक अचानक अब वहाँ की शान्ति करते भङ्ग हैं,
आकाश के बहु रङ्ग-जैसे भूमि के भी ढङ्ग हैं ॥७॥

आमोद बरसाती जहाँ थी यज्ञ-धूममयी घटा,
यश-तुल्य जिस अमोद की थी स्वर्ग में छाई छटा ।
अब प्लेग-जैसी व्याधियों की है वहाँ फैली हवा,
चलती नहीं जिस पर धुरन्धर डाक्टरों की भी दवा ! ॥८॥

 

Leave a Reply