प्रलय-दूसरा सप्तक-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

प्रलय-दूसरा सप्तक-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

एक दिन होगी प्रलय भी;
मिट (मत) रहेगी झोपड़ी,
मिट जायेंगे नीलम-निलय भी।

सात है सागर किसी दिन
फैल एकाकार होंगे,
पंच तत्वों मे गये बीते
बिचारे चार होंगें,
धार मे बहना कहाँ का
अतल तक डुबकी लगेगी;
जागना तब व्यर्थ ही होगा,
अगर जगती जगेगी!
देखने की चीज़ होगी
मृत्यु की वैसी विजय भी।
एक दिन होगी प्रलय भी।

जब समुन्दर बढ़ रहा होगा,
बड़ी भगदड़ मचेगी,
और बडवानल निगोड़ी,
सामने आ कर नचेगी,
क्या बुझाएंगे फायर पम्प
मन मारे जलेंगे,
मौत रानी के यहाँ
उस दिन बड़े दीपक बलेंगे
लजा कर रह जायगी
उस रोज़ विद्युत् की अन्य भी।
एक दिन होगी प्रलय भी।

हर हिमालय श्रृंग पर
उठती लहर की ताल होगी,
और बर्फीली सतह
बडवाग्नि पीकर लाल होगी,
कल होंगी तारिणी गंगा,
तरनिजा व्याल होंगी;
और शिव होंगे न शंकर,
कंठगत नर-नाल होगी;
कर न पायेगा हमें आश्वस्त
जननी का अभय भी।
एक दिन होगी प्रलय भी !

हम की मिट्टी के खिलोने,
बूंद पड़ते गल मरेंगे!
हम की तिनके धार मे बहते,
शिखा छू जल मरेंगे;
नाश की किरणे कि द्वादश
सूर्य से श्रृंगार होगा;
कौन सा वह बुलबुला होगा
कि मत अंगार होगा—
किस तरह वरदा सफल
होंगी बहुत होकर सदय भी।
एक दिन होगी प्रलय भी!

वह प्रलय का एक दिन,
हर दिन सरकता आ रहा है;
काल गायक गीत धीमे ही
सही, पर गा रहा है;
उस महा संगीत का हर
प्राण में कम्पन चला है;
उस महा संगीत का स्वर,
प्राण पर अपने पाला है;
आँख मीचे चल रहा है जग
कि चलता है समय भी।
एक दिन होगी प्रलय भी!

इस दुखी संसार में जितना
बने हम सुख लुटा दें;
बन सके तो निष्कपट मृदु हास के,
दो कन जुटा दें;
दर्द कि ज्वाला जगायें ,नेह
भींगे गीत गायें;
चाहते हैं गीत गाते ही रहें
फिर रीत जायें;
यह कि तब पछतायगी अपनी
विवशता पर प्रलय भी।
मत रहे तब झोपड़ी
मिट जय फिर नीलम निलय भी!

 

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