प्रभाती -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 2

प्रभाती -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 2

प्रसाद जी की पुण्य स्मृति में

भारतीय सुसंस्कृति के गर्व
औ अभिमान !
बुद्ध की सबुद्धि के कल्याण-
मय आख्यान !
आर्य-गौरव के अलौकिक दिव्य
उज्ज्वल गान!
राष्ट्रभाषा के विधाता, श्री,
सुरभि, सम्मान !

नित्य मौलिक, ऐतिहासिक, चिर-
विचारक आप,
भावना औ’ ज्ञान के युग पद,
समन्वित छाप!
त्याग आज सकाम जगती, तुम
चले निष्काम,
युग प्रवर्तक, क्रान्त दर्शी, तुम्हें
सतत प्रणाम !

 

महाकवि पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय के प्रति

आज नगरी में हमारी
कौन सा मेहमान आया ?
तिमिर में दीपक जला है,
भक्त – गृह भगवान आया।

सित बने हैं केश काले
की कठिन किसने तपस्या ?
भाव – भाषा – छंद की
सुलझी सभी उलझी समस्या !

आज कवि के कंठ में क्यों
लिए नवरस गान आया?
आज नगरी में हमारी
कौन सा मेहमान आया ?

आज किसकी अस्थियों में
उठ खड़ी भाषा हमारी?
सींच किसने रक्त से
कर दी हरी आशा हमारी !

कौन पतझर में हमारे
मधुर मधु का दान लाया ?
आज नगरी में हमारी
कौन सा मेहमान आया ?

गोमती के भाग्य पर
करती स्पृहा है गंगधारा,
अवध ही की गोद में क्यों
अवध का हरि है पधारा ?

रंक रसिकों की कुटी में
आज नव वरदान आया ।
आज नगरी में हमारे
कौन सा मेहमान आया ?

 

‘रत्नाकर’

एक स्वर्णकण खो जाने से
हो उठता उर कातर,
कैसे धैर्य धरे वह जिसका
लुट जाये ‘रत्नाकर’ !

 

भैरवी के जन्मदिवस पर

आज अवंध्या बनी, स्वर्ण संध्या में प्रतिभा रागमयी,
आज महोत्सव हो मेरे गृह, रसना हो अनुरागमयी ;
रोमों में ले पुलक, साधना बैठी बनी सुहागमयी,
गत विहाग की निशा; उषा है आज ‘भैरवी’ रागमयी!
चलो आज कवि! अमृत-अर्घ ले
श्रान्त, कलान्त पद को धोने,
जीवन के ऊजड़ ऊसर में
हरे – भरे अंकुर बोने !

कवि ! सोचो मत अब तक तुमने नहीं नई उपमायें दी,
नई कल्पना, नये छंद, गति, नहीं नई रचनायें दी !
अमृत-कलाकरों का अब तक तुमने नहीं किया सम्मान,
नंगे-भिखमंगों में गाये तुम ने भूख-प्यास के गान ;

नहीं चाहिए गीत और अब,
है न माँग मृदुतानों की,
शोणित की, शिर की, प्राणों की,
है पुकार बलिदानों की!

 

Leave a Reply