प्रत्यावर्तन-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

प्रत्यावर्तन-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

प्रत्यावर्तन

कुलवन्ती! तू भी छोड़ गयी क्या मुझको?
क्यों मेरा रहना यहाँ इष्ट था तुझको।
रख कर तेरी सौगन्ध रहूँगा अब मैं;
मरणाधिक दुख आमरण सहूँगा अब मैं ॥1॥

तू जहाँ गयी भय नहीं वहाँ पर कोई;
पर मैंने अपनी आज हृदय-निधि खोई।
मरने का अवसर खोज रहा हूँ अब मैं,
यह तो कह जाती कि पा सकूँगा कब मैं ॥2॥

मिथ्या हो सकती नहीं सती की वाणी,
बड़वाग्नि बुझा सकता न सिन्धु का पानी।
अनुभव करता हूँ परम सत्यता तेरी,
क्या स्वप्न मात्र है प्रिये! कथा वह मेरी? ॥3॥

दो सहृदय साहब यहाँ शीघ्र ही आये;
दुख देख हमारे चार नेत्र भर लाये।
ऐन्ड्रयूज-पियर्सन विदित नाम हैं उनके,
मनुजोचित मंगल मनस्काम हैं उनके ॥4॥

उनकी रिपोर्ट पढ़ दशा हमारी जानों,
फिर मैंने जो कुछ कहा सत्य सब मानों।
पशु कर रक्खें जो मनुज कहीं मनुजों को,
पशु क्यों न कहूँ उन मनुज रूप दनुजों को ॥5॥

अन्यान्य अनेक मनुष्य भाव के मानी,
यों देख सके उसकी न यहाँ पर हानि।
निज दुर्गति सुन चौंकने लगा भारत भी,
हा! ‘भी’ पद पर आसीन जगा भारत भी ॥6॥

समझी भारत सरकार अन्त में बातें,
निज कुली प्रजा के साथ यहाँ की घातें।
थे बड़े लाट हार्डिज-भला हो उनका-
सह सके न लगना न्याय-दण्ड में घुन का ॥7॥

थे यदपि यहाँ के वणिक वर्ण से भाई,
देखा न उन्होंने स्वार्थ, दया दिखलाई।
बस पक्षपात से न्यायशील डरते हैं,
आत्मा का कभी विरोध नहीं करते हैं ॥8॥

क्या किया उन्होंने नहीं जानता हूँ मैं,
पर उन्हें न्याय का रूप मानता हूँ मैं।
थी तीन नरों में जहाँ एक ही नारी,
टूटी आखिर वह कुली प्रथा व्यभिचारी ॥9॥

बिजली ने यह वृत्तान्त यहाँ जब भेजा,
दहला वणिकों का वज्र समान कलेजा।
हम सब के उर में इधर फिरी बिजली-सी,
डीपो वालों पर उधर गिरी बिजली-सी ॥10॥

उन मृगों से कि जो जटिल जाल से छूटे,
पूछो हम ने जो सौख्य उस समय लूटे।
जय जय करके सब सुधा स्वाद लेते थे,
मृत बन्धु जनों को सुसंवाद देते थे॥11॥

उस घृणित प्रथा से मुक्ति देश ने पायी;
फिर हम लोगों के लिए शुभ घड़ी आयी।
भारत को लौटे चले जा रहे हम हैं;
बह गया हुआ स्वातन्त्र्य पा रहे हम हैं॥12॥

कुलवन्ती, तू क्यों आज कुछ नहीं कहती,
तेरे शोणित में कुली-प्रथा है बहती।
लेकर मैं तेरे फूल चला भारत को,
तू एक बार तो देख भला भारत को ॥13॥

भारत! फिर क्यों तू याद आ रहा मुझको,
क्यों दिन दिन अपने निकट ला रहा मुझको।
आता है मेरी ओर आज तू ज्यों ज्यों,
होता है मुझको महामोद क्यों त्यों त्यों ॥14॥

अब अपना कहने योग्य कौन है तुझमें,
जो है तेरा अभिमान, आज भी मुझमें।
तू तो है तुझमें देश! आज भी मेरा,
तुझमें है भाषा-वेश आज भी मेरा ॥15॥

तेरे गीतों में भाव भरा है मेरा,
तेरी चर्चा में चाव भरा है मेरा।
तुझ में पुरुखों का गेह बना है मेरा,
तेरे तत्त्वों से देह बना है मेरा ॥16॥

तुझ में अब भी कुल रीति नीति है मेरी,
इस कारण तुझ पर परा प्रीति है मेरी।
पाता हूँ जग में कहीं न तेरी समता,
होती विदेश में ही स्वदेश की ममता ॥17॥

यद्यपि तुझ में है दुःख निरन्तर पाया,
पर जा सकता तू नहीं कदापि भुलाया।
तू मेरा है यह भाव रहेगा मन में,
जब तक ये मेरे प्राण रहेंगे तन में ॥18॥

देखूं, भारत! मैं तुझे देखता हूँ कब,
इच्छा है केवल एक यही जी में अब।
हमको स्वदेश जलयान, शीघ्र पहुँचाओ,
वह स्वप्न दृश्य प्रत्यक्ष सामने लाओ॥19॥

 

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