प्रतीति-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

प्रतीति-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

एक मग्न प्यार के प्रदेश से गुज़रकर
मैं अपनी
यायावर-स्मृति से हटा नहीं पाता हूँ-
वे उदास भुतियाले खँडहर

उनमें थोडा बच जाता हूँ।
बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें
बहुत… ।
लेकिन बार-बार
उस मुर्दा पीढ़ी के बीच से गुज़रने वाली राहों को
मैं जिनसे होकर तुम तक आता हूँ,
उन्हीं खँडहरों में,
उन्ही सूनी भुतियाली-सी जगहों में
बल खाते पाता हूँ;

एक संक्रांति-काल होता हे तुमसे मिलना
जिसमें कुछ अंतराल भरता है,
एक मृत्यु होती है तुमसे हट आना
जिसमें उस थकी-सी दशाब्दी का जहाज़
डगमगाता हुआ दृश्य में उभरता है ।
लेकिन मैं तोड़ डालने वाली यात्राएँ जीकर भी
तुम तक आ जाता हूँ।
बार-बार लगता है-
मैं जैसे यात्रा से लौटा हूँ
तुम जैसे यात्रा पर निकली हो।

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