प्रतीक्षा-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

प्रतीक्षा-आखिर समुद्र से तात्पर्य-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

इन सूखे पत्तों पर मत चलो
देखते नहीं
इनकी भाषा कैसी चरमरा उठती है?
और इस चरमराने को सुन
वृक्ष चौंकते ही नहीं
उन्हें दर्द होता है।
क्या तुम प्रतीक्षा नहीं कर सकते?
अभी चैत्र-हवा आएगी
और देखना–
धरती पर
अपने खिलखिलाने की भाषा लिखते हुए
ये पत्ते स्वयं
मैदानों-चरागाहों तक दौड़ जाएँगे।
क्या तुम
इतनी भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते?

 

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