प्रणय-परिक्रमा-किस करवट जीवन -राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

प्रणय-परिक्रमा-किस करवट जीवन -राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

युग बीते पर चाह दबी है मन में
प्रेम-प्रसंग अनेक पर एक सृष्टि है
गगन-विस्तृत नयनों की एक दृष्टि है
तुम्हें देख फिर स्मृतियाँ उभरी जीवन में
युग बीते पर चाह दबी है मन में ||१||

तुम्हारे गोद में लेटा जब आसमान देखा
लगा सुख-दुःख है जीवन की एक ही रेखा
अकेला नहीं मैं, है साथ कोई इस विजन में
युग बीते पर चाह दबी है मन में ||२||

आंखे मिलीं, बातें बनी, और स्पर्श हुआ
निशा वक्ष पर फिर अलौकिक हर्ष हुआ
किंतु काल हंसा, कहीं श्राप छिपा है तन में
युग बीते पर चाह दबी है मन में ||३||

मन रुआंसा भूला नहीं आज तक इतिहास
आशा अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ी
उर पर धीरे अमरलता सी चढ़ी
स्वप्न में, कभी यथार्थ में दे जाती मृदु आभास
मन रुआंसा भूला नहीं आज तक इतिहास ||४||

अब हुई पूरी साथ रहने की लंबी प्रतीक्षा
जयमाला पहन कर मिली जीने की दीक्षा
अग्नि की परिक्रमा फिर जगा गई कितने मधुमास
मन रुआंसा भूला नहीं आज तक इतिहास ||५||

चादर ओढ़ छिपी रजनी लज्जा से
पर अंदर मुस्कुराती रही सुमुखि सज्जा से
अधर जुड़े, दिशा बदली, खिले तपन में अमलतास
मन रुआंसा भूला नहीं आज तक इतिहास ||६||

सुख की कल्पना भस्म हुई उसी कुंड में
पहले उसके फिर मेरे पग राह में पड़ते
कितने स्वप्न फिर आपस में छल से लड़ते
दुःख बिसुराये अब, सुख झूठा ही भरे मुंड में
सुख की कल्पना भस्म हुई उसी कुंड में ||७||

प्रथम दिवस से ही यत्न में जुटे
बटोर लें जितना स्वर्ग, चाहे राह में लुटें
खो कर सब आज, हम मिले अंधों के झुंड में
सुख की कल्पना भस्म हुई उसी कुंड में ||८||

अभी भी क्यों टिकी है माया पर आँख मेरी
समझ अभी भी, काया सिधारी, बची है राख मेरी
मिथ्या है प्यार, फिर कैसा है अभिसार तुण्ड से
सुख की कल्पना भस्म हुई उसी कुंड में ||९||

प्यार की पिपासा, चुनौती नहीं मन की रुग्णता है
आशाओं की असमर्थता कितनी करुण है
अश्रु भी सांत्वना देते, उर तो कल सा ही तरुण है
मन कहता, सोचो  हिमपात में भी कितनी उष्णता है
प्यार की पिपासा चुनौती नहीं, मन की रुग्णता है ||१०||

परिक्रमा पूरी हुई,  तो लगा घूमें हम संसार बांधे
दिन बीते, रातों में प्रणय रोया फिर प्रतिकार बांधे
मन  मूर्छित हुआ, पर तन में भरी कितनी सहिष्णुता है
प्यार की पिपासा चुनौती नहीं, मन की रुग्णता है ||११||

उसकी किशोर स्मृतियाँ मेरे शीश मढ़े हैं
नित करता हूँ अर्ध्य, आरती के सुमन चढ़े हैं
सुख लांघ गया मैं, दुःख की यही निपुणता है
प्यार की पिपासा चुनौती नहीं, मन की रुग्णता है ||१२||

कल तक हँसता प्राण, आज हवन सा जला है
अग्नि की परिधि पर स्पर्श हुआ अनूठा
मन उछला, दुःख छूटा, जग का भ्रम टूटा
फिर मरीचिका के पीछे, दिन-रात ह्रदय ढला है
कल तक हँसता प्राण, आज हवन सा जला है ||१३||

समय चले प्रणय हुआ प्रहरों पर निछावर
मूर्ति बनी वह स्नेह लुटाई निर्बंध निभा कर
फिर अंतरंग सिमटा, मन बुझा, जाने जीवन कहाँ चला है
कल तक हँसता प्राण, आज हवन सा जला है ||१४||

मन भ्रमर सा है, सुमन देख झूमता है
अपमान सह कर भी पास ही घूमता है
निर्वासित हो कहाँ जाता, उसी छाँव में जो पला है
कल तक हँसता प्राण, आज हवन सा जला है ||१५||

रात चढ़ी, आँखों में फिर तुम्हारी प्रतीक्षा है
वे छोटे दिन, लंबी रातें, और अधरों की हाला
आज ह्रदय से उतर कहीं खो गयी है मधुबाला
प्रणय अधूरा फंदा बाँधा, यह कैसी नयी परीक्षा है
रात चढ़ी, आँखों में फिर तुम्हारी प्रतीक्षा है ||१६||

मन कट्टर हो जाता, पर काया की है बात निराली
फिर लड़ती शत नग्न सत्य से, जो यम सी है काली
थका अब मैं, नयी दिशा चलूँगा,तुमने ही बांटी दीक्षा है
रात चढ़ी, आँखों में फिर तुम्हारी प्रतीक्षा है ||१७||

तुमने जो छोड़ा, राह मैं अपनी स्वयं चलूंगा
पर जन्मों तक तुम्हारा यह लेश नहीं भूलूंगा
धर्म की सांत्वना भी, तुम्हारी झूठी भिक्षा है
रात चढ़ी, आँखों में फिर तुम्हारी प्रतीक्षा है ||१८ ||

कितनी बार लौटा, किवाड़ तो दिनों से बंद है
आसमान नहीं, मैंने तुमसे समय का एक टुकड़ा माँगा
अभिसार सींचने, तुम्हारी आंखों में एक स्वप्न टांगा
छल गया वह भी, क्या करूं अनुराग की मति मंद है
कितनी बार लौटा, किवाड़ तो दिनों से बंद है ||१९||

हर सुबह सोचता हूँ, आज स्नेह कुछ नया है
जोड़ता हूँ फिर तिनके,जैसे छा गया सावन है
मैं गर्दभ, समझूँ  वैशाख में ही रिम-झिम आनंद है
कितनी बार लौटा, किवाड़ तो दिनों से बंद है ||२०||

तुम प्राण मेरी, कहो तो त्याग दूँ यह काया
निष्ठुर न बनो, अब तो दे जाओ थोड़ी माया
मैं निर्लज्ज शिला, जिसे अब अवज्ञा ही पसंद है
कितनी बार लौटा, किवाड़ तो दिनों से बंद है ||२१||

तुम्हारी परिक्रमा में मूर्छित,आज मैं विक्षिप्त हुआ
सामने तुम हो पर वह अनुभव अब अदृश्य हुआ
प्यार ढूंढता मैं सवर्णों में ही आज अस्पृश्य हुआ
जीवन के इस मंथन में, मैं विष पीकर ही तृप्त हुआ
तुम्हारी परिक्रमा में मूर्छित,आज मैं विक्षिप्त हुआ ||२२||

दोष मेरा ही है जो तुझमें गगन सा विस्तार देखा
वह बादलों का रेला था, ले उडा अपनी सीमा रेखा
फिर चांदनी भी बिसुरी, मन आंसुओं में ही लिप्त हुआ
तुम्हारी परिक्रमा में मूर्छित,आज मैं विक्षिप्त हुआ ||२३||

रात में प्यार कहता, अब अंधेरे ही दिया जलाओ
आपस की कुछ रही नही, फिर क्यों जग झुठलाओ
दूरियों में ही सुख है, देख तारों को यह ज्ञान प्रदीप्त हुआ
तुम्हारी परिक्रमा में मूर्छित,आज मैं विक्षिप्त हुआ ||२४||

मति पर मिट्टी डाले, मन बावला अपनी ही माने
पत्थर से टकरा कर, उस पर ही सर फोड़े
ऐसे पुरुषार्थ की गरिमा कोई कैसे तोड़े
मदिरा पी, चला  मैं बंद सीपियों में कंचन पाने
मति पर मिट्टी डाले, मन बावला अपनी ही माने ||२५||

‘नही’ का अर्थ समझ जाऊं तो क्यों ‘हाँ’ की आस करूँ
अंधे कुएँ की दीवार नोचता  क्यों अपना ही उपहास करूँ
रात बरसी अवहेलना, फिर भी छू जाता है उसे अनजाने
मति पर मिट्टी डाले, मन बावला अपनी ही माने ||२६||

प्यार कहीं खोया, मन-मस्तिष्क बवंडर हुआ
सींचा-बोया हाथों से, बसा घर खंडहर हुआ
कौन सहलाता प्यार, उसने तो मरने की ठानी
मति पर मिट्टी डाले, मन बावला अपनी ही माने ||२७||

आज परिक्रमा टूटी, प्रणय से मुक्त यह जीवन हुआ
वमन हुआ प्यार का, रात बहुत रोयी
अलग हुए कमरे, माया अंधियारे में खोयी
चिता बुझी प्यार की, राख उठा उसका तर्पण किया
आज परिक्रमा टूटी, प्रणय से मुक्त यह जीवन हुआ ||२८||

रात गए, दशकों का प्यार क्षण में  प्रेत बना
रंगो भरा इतिहास आँखों में समाया श्वेत-घना
साथ बचा केवल मैं, और दूर रात में बोलता घुघुआ
आज परिक्रमा टूटी, प्रणय से मुक्त यह जीवन हुआ ||२९||

यह गणिकाओं की कथा नहीं, नग्न सत्य है मेरा
इतनी भी वितृष्णा कैसी, तुमने मुझसे जो मुंह फेरा
नीड़ से उड़े बच्चे, तुम बिछुड़ी, बचा दुःख ही क्षण-क्षण छुआ
आज परिक्रमा टूटी, प्रणय से मुक्त यह जीवन हुआ ||३०||

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