प्रकृति की अद्भुत यात्रा-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

प्रकृति की अद्भुत यात्रा-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

सुनो मैंने एकटक होकर तुम्हें निहारा है
रात की पहली गन्ध को
तुझमें ही झारा है
अनगिन तारों को चिट्ठियाँ सौंपी हैं
शब्द साधे हैं, नाम पुकारा है
और जो अविकार है, उसे ही निहारा है

वह जो प्रत्यक्ष है
सच है : मेरे व्यतीत का ध्यान है
वह जो दीखता नही
वह क्यों है, कितना उसका भान है ?
यह वह है जिसे कि तुझको सौंप चला हूँ
अब जो भी है वह तुम में ही गतिमान है !

अकेलेपन को कोई ध्वनि टेरती है
सागर को पार करता सूरज काँपता है
किनारे पर के तरङ्ग बौछार उतारते हैं
रेत कनखी मारे बीच को ताड़ती है
हर परिवर्तन में जो स्थायी है ;
वह अपरिचिता है, दूर तक पसरी खाई है

चूमता हूँ
उस वाष्प को जो छोड़कर उठता है
सहराता हूँ
वह स्पर्श जो भाव को मनाने लौटा है
यह समूचा रङ्ग है
जो उतरते हुए भी अपने जितना ही रहता है

अगणित हैं द्वार
चुप हैं बोलियाँ, चुप से हैं मन के तार
वह इस पार है या कि उस पार :
टटोलता हूँ रुक रुककर बारम्बार
जाग्रत है वह जो नींद को बुलाता है
कि इतना ही है वह प्रतिपल, इतना ही अपरम्पार !

मैं पीछे खड़ा हूँ
तुम सुनो मुझे आगे से कहते हुए
मैं मुड़ता हूँ
तुम और बढ़ चलो कि देश छूटता है
क्यों अकेला है मेरा बीतता रुका हुआ यह घर
या कि मेरा वह निःसङ्ग जो कि तुझमें ही हारता है

चारो दिशाओं को लपेटती यह बाहें
तुम्हें भी सँग-सँग पचाती हैं
दिगन्त को फेरती यह राहें
तुम्हें भी चेहरा दिखाती हैं
खिलता सूरज इस प्रतिबिम्ब को रखता है
और बदल जाता है धरती पर नाचता सूरजमुखी

वही जो मुझमें आयत है
निर्विषङ्ग है, निर्लक्ष्य है
वह जो पीत पटल से बरसती है;
मेरे सिक्तता की अनुमात्रा है
ओ प्रेम से आँख मिलाते रात के उजले भोर
देखो कितनी सुन्दर यह चलती हुई यात्रा है।

 

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