पैग़ाम-ए-अमन- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

पैग़ाम-ए-अमन- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

 

हवा मिट्टी फल फूल दरिया
रौशन किरनों से सुनहरी सवेरा

जशन मेले लिबास ज़बां दसतूर
सांझे हैं सभी ज़माने में मशहूर

फिर ये झगड़ा ये ख़राबा क्यों है ?
सरहद पे आख़िर ये तनाजा क्यों है ?

कौन कहता है पराया, तुम हमसाया हो
भाई से बढ़कर मां-जाया हो

तेरे घर के धुएं से दम घुटता है
जब महके चमेली तो दिल खिलता है

अर्थी हो या जनाजा दर्द वही है
लाश तो हर हाल में लाश रही है

मन्दर में लगे गिल या मस्जिद में लगे
ज़ात तो मिट्टी की मिट्टी ही रही है

ख़ता किसी की सज़ा हम क्यों पाएं ?
रोज़ जियें हम रोज़ क्यों मर जाएं ?

मुबतिला-ए-रंज रहें ये मन्जूर नहीं
हमने जो चाही थी ये वोह तसवीर नहीं

बेहतर तो यही है अब निपटारा कर लें
अब चाहे कुछ हो जाए हम गुज़ारा कर लें

ये तफ़रीक नहीं वाजिब बहुत हो ली
बाहम मिल के मनाएं हम ईद और होली

आयो कि हम मस्जिद में दीप जलाएं
मन्दर से अपने यज़दां को बुलाएं

नानक औ चिश्ती का फ़रमान यही है
‘कुदरति के सभ बन्दे’ क्या ख़ूब कही है

तलवार से अमन की खेती नहीं पकती
जंग किसी भी सूरत हो अच्छी नहीं होती

फूल मुहब्बत के अब तो ऐ दोस्त ! खिला दें
मोजिजा ये दुनिया को करके दिखला दें

बच्चों के लिए हम कुछ तो कर जाएं
उमर कम है ‘बेताब’ अब तो सुधर जाएं

(३ सितम्बर २००७ को पाकिस्तान के दयाल सिंह कलचरल आडीटोरियम में पढ़ी गई)

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