पेड़ से लिपटी बेल-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

पेड़ से लिपटी बेल-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

एक पुराने
और घनेरे पेड़ की इक डाली से लिपटी
बेल में
सारी पेड़ की रंगत
पेड़ की ख़ुश्बू
समा गई थी
बेल भी पेड़ का इक हिस्सा थी
पेड़ के बारे में
यूँ तो सौ अफ़्साने थे
बेल का कोई ज़िंक्र नहीं था
वो ख़ामोश-सा इक क़िस्सा थी

पेड़ पे रंगों का मौसम था
बेल पे जैसे
हल्की-सी मुस्कान के
नन्हें फूल खिले थे
लेकिन
फिर ये मौसम बदला
और बड़ी ज़हरीली हवाएं
पेड़ गिराने
चारों दिशाओं से जब लपकीं
यूँ लगता था
पेड़ हवा में
पत्ता-पत्ता बिखर रहा है
यूँ लगता था
सारी शाखें टूट रही हैं
यूँ लगता था
सारी जड़ें अब उखड़ रही हैं
पल दो पल में
पेड़ ज़मीं पर
मुँह के बल गिरनेवाला है
पर जो हुआ
वो क़िस्सा भी सुनने वाला है

पेड़ जो काँपा
बेल के तन-मन में जैसे
इक बिजली दौड़ी
रेशम जैसी बेल का रेशा-रेशा
जैसे लोहे का इक तार बना
और बेल ने
सारी टूटी शाख़ों को
यूँ बाँधा
पेड़ के सारे घायल तन को
यूँ लिपटाया
पेड़ की हर ज़ख़्मी डाली को
कुछ यूँ थामा
जितनी थीं ज़हरीली हवाएं
पेड़ से सर टकरा-टकरा के
हार गई हैं
हाँप रही हैं
होके परीशाँ
हक्का-बक्का देख रही हैं

वक़्त के भी हैं खेल निराले
बेल अपनी बाँहों में अब है पेड़ संभाले
धीरे-धीरे
घायल शाख़ों पर
पत्ते फिर निकल रहे हैं
धीरे-धीरे
नई जड़ें फूटी हैं
और धरती में गहरी उतर रही हैं
बेल पे जैसे
एक नई मुस्कान के नन्हे फूल खिले हैं।

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