पेड़ गिरना चाहता है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

पेड़ गिरना चाहता है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

पेड़ गिरना चाहता है।

सात दिन से से रहे थे,
जो कि दो अण्डे दिये थे,
आज बच्चे बन गये थे,
किन्तु सूना हाय! खग का नीड़ होना चाहता है।
पेड़ गिरना चाहता है।

लो गिरा वह तरु हहरकर,
घोंसला भी तो खिसक कर,
विकल जोड़ा विहग का पर,
प्राण देकर भी अरे! उसको बचाना चाहता है।
पेड़ गिरना चाहता है।

रुक गया वह घोंसला फिर,
दूसरे तरु से उलझ कर,
पर गिरे बच्चे निकल कर,
हाय! खोकर भी खजाना नीड़ रहना चाहता है।
पेड़ गिरना चाहता है।

विहग ने जब दृष्टि डाली,
नीड़ अटका, किंतु खाली,
लख, नयन में रेख काली-
छा गई, उस नीड़ को वह अब मिटाना चाहता है।
पेड़ गिरना चाहता है।

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