पूर्णिमा-किस करवट जीवन -राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

उत्सव
पूर्णिमा-किस करवट जीवन -राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

बादलों से उभरती पूर्णिमा
तुम शरद की टपकती सुधा हो
बरसों से तुम्हे निहारता जी रहा हूँ
तुम ही प्राण हो, मेरे मन की मृदा हो

नव कोमल कलियों सी खिली-खिली
क्या सोच रही हो अनुराग भरी
आ जाओ पास, बंध जाओ अनुबंधन में
निचोड़ लें जीवन, जो दूर कहीं है ठहरी

तुम तन-मन की आकर्षण
मधु सी अधरों में जैसे जम गई
तुमसे ही मेरा अस्तित्व बना
अब खोयी नहीं है कोई दिशा नयी

जनमों तक साथ रहेंगे
पुकार लो चाहे हम हों कहीं
ईश्वर से माँगा है तुम्हे
पास हो तुम तो स्वर्ग है वहीं

Leave a Reply