पूछना है-त्रिकाल संध्या-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

पूछना है-त्रिकाल संध्या-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

सूरज ने
ऊपर
मेरे घर
की छत पर
हल
चला दिया है

और उतर कर
उसने नीचे
मेरे आँगन के
बिरवे पर
आता हुआ
फल
जला दिया है

इसीलिए
मेरे चौके में
सारी की सारी सब्ज़ी
बाज़ार की है

और खाते हैं
बाज़ार के ही लोग
बैठकर
मेरे चौके में
मैं बचा नहीं पाया
चौके का
बाज़ार हो जाना

क्योंकि
मचा नहीं पाया
घर में
बाज़ार वालों की
तरह
शोर

इसीलिए वे
नाराज़ हो गये
और नाराज़ होकर
उन्होने
मेरे घर को
बाज़ार कर दिया

यह बात तो
एक हद तक
समझ में
आती है

मगर समझ में
यह नहीं आया
कि सूरज ने
मेरे घर की छत पर
हल क्यों चला दिया

और उसने
नीचे उतर कर
मेरे आँगन के
बिरवे पर
आते हुए फल को
क्यों जला दिया

क्या करता मैं
इसे जानने के लिए
सिवा सूरज से
इसका सबब
पूछने के लिए
निकल पड़ता

चल पड़ता
इसीलिए उदय और अस्त के
धनी
अँचलों की ओर

पीठ देकर
बाज़ार के
शोर को !
(“नीली रेखा तक” से)

 

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