पुल के पाये पर- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

पुल के पाये पर- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

सुबह के समय
सुंबुल पुरवैया में झूमता हुआ
शाम के समय
बादल गोद में आग सम्हारता हुआ
घाव-लाल और ताज़ा
दाग़-मिटता हुआ
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

बचपन की तितली खो गयी
द्वीपो में जलपरियों से पूछा
बोलीं : चोटियों पर की बर्फ पिघला करती है
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

तलवे जलाते रहे सहरा-सहरा
अरे हैरान हिरणियों के मतवाले!
नजद की पहाड़ी पुकार-पुकार गूंज रही है
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

टिमटिमाते दीपक की कहानी सुनाई जा रही थी
कथा सुनाने वाले की आँख लग गयी
उपरली टहनी का तोता भी गूंगा होना चाहता है
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

गाँव की गचदार रंगीन कोठरी बारिश तले फँस गयी
शहर की धूम मचाती मस्तियाँ ताबूत में दुबक गयीं
अरी ओ कान की बाली! तू भी हिलती-झुलती हुई !
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

हाय रंग-रूपों की लीला
वृत्त में आ कर नाचने में मग्न हो जाये!
होठों पर मुस्कान खिलाता हुआ और दिल को जलाता हुआ
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

खुली नाव में बैठे-बैठे
तेरा भी कुछ चप्पू चलाना
मेरा भी घाट-घाट को टकटकी लगा कर देखना
वारी जाऊँ, यहाँ तो अपने को आप झुलाना है
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

शून्य में अजनबी पुकार-पुकार
किस-किस की करे अनसुनी
क्या-क्या सहते रहें
दिन ढले की झकड़ ने देवासुर वृक्ष डगमगाते देखे
एक दरिया बहता हुआ भागता हुआ

 

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