पीपल छाँव-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Peepal Chhanv part 1

पीपल छाँव-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Peepal Chhanv part 1

तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है

तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है
ये शौक़ वो है जो ज़ेवर उतार लेता है

मैं आसमां की बुलन्दी पे बारहा पहुंचा
मगर नसीब ज़मीं पर उतार लेता है

अमीरे-शहर की हमदर्दीयों से क्च के रहो
ये सर से बोझ नहीं, सर उतार लेता है

उसी को मिलता है एजाज़ भी ज़माने में
बहन के सर से जो चादर उतार लेता है

उठा है हाथ तो फ़िर वार भी ज़रूरी है
कि सांप आंखों में मंज़र उतार लेता है

जो तीर भी आता है वो ख़ाली नहीं जाता

जो तीर भी आता है वो ख़ाली नहीं जाता
मायूस मेरे दर से सवाली नहीं जाता

वो मैला-सा, बोसीदा-सा आंचल नहीं देखा

वो मैला-सा, बोसीदा-सा आंचल नहीं देखा
मुद्दत हुई हमने कोई पीपल नहीं देखा

ख़ूबसूरत झील मे हंसता कंवल भी चाहिए

ख़ूबसूरत झील मे हंसता कंवल भी चाहिए
है गला अच्छा तो फ़िर अच्छी ग़ज़ल भी चाहिए

उठ के इस हंसती हुई दुनिया से जा सकता हूं मैं
अहले-महफ़िल को मगर मेरा बदल भी चाहिए

सिर्फ़ फूलों से सजावट पेड़ की मुमकिन नहीं
मेरी शाख़ों को नये मौसम में फल भी चाहिए

ऐ मेरी ख़ाके-वतन, तेरा सगा बेटा हूं मैं
क्यों रहूं फ़ुटपाथ पर मुझको महल भी चाहिए

धूप वादों की बुरी लगी है अब हमें
अब हमारे मसअलों का कोई हल भी चाहिए

तूने सारी बाज़ियां जीती हैं मुझ पर बैठ कर
अब मैं बूढ़ा हो गया हूं अस्तबल भी चाहिए

फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं

फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं

अन्धेरी रात मे अक़्सर सुनहरी मशअलें लेकर
परिन्‍दों की मुसीबत का पता जुगनू लगाते हैं

दिलों का हाल आसानी से कब मालूम होता है
कि पेशानी पे चन्दन तो सभी साधू लगाते हैं

ये माना आप को शोले बुझाने में महारत है
मगर वो आग जो मज़लूम के आंसू लगाते हैं

किसी के पांव की आहट से दिल ऐसे उछलता है
छलांगे जंगलों में जिस तरह आहू लगाते हैं

बहुत मुमकिन है अब मेरा चमन वीरान हो जाये
सियासत के शजर पर घोंसले उल्लू लगाते हैं

हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आये

हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आये
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आये

तलवार की मियान कभी फ़ेंकना नहीं
मुमकिन है, दुश्मनों को डराने के काम आये

कच्चा समझ के बेच न देना मकां को
शायद ये कभी सर को छुपाने के काम आये

मुफ़लिसी पासे-शराफ़त नहीं रहने देगी

मुफ़लिसी पासे-शराफ़त नहीं रहने देगी
ये हवा पेड़ सलामत नहीं रहने देगी

शहर के शोर से घबरा के अगर भागोगे
फ़िर तो जंगल में भी वहशत नहीं रहने देगी

कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे
मां कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी

आप के पास ज़माना नहीं रहने देगा
आप से दूर मोहब्बत नहीं रहने देगी

शहर के लोग बहुत अच्छे हैं लेकिन मुझको
‘मीर’ जैसी ये तबीयत नहीं रहने देगी

रास्ता अब भी बदल दीजिए राना साहब
शायरी आप की इज़्ज़त नहीं रहने देगी

हिज्र में पहले-पहल रोना बहुत अच्छा लगा

हिज्र में पहले-पहल रोना बहुत अच्छा लगा
उम्र कच्ची थी तो फ़ल कच्चा बहुत अच्छा लगा

मैंने एक मुद्दत से मस्जिद भी नहीं देखी मगर
एक बच्चे का अज़ां देना बहुत अच्छा लगा

जिस्म पर मेरे बहुत शफ़्फ़ाक़ कपड़े थे मगर
धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा

शहर की सड़कें हों चाहे गांव की पगडण्डियां
मां की उंगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा

तार पर बैठी हुई चिडियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बच्चा बहुत अच्छा लगा

हम तो उसको देखने आये थे इतनी दूर से
वो समझता था हमें मेला बहुत अच्छा लगा

ऐ हुकूमत, तेरा मेआर न गिरने पाये

ऐ हुकूमत, तेरा मेआर न गिरने पाये
मेरी मस्जिद है ये मीनार न गिरने पाये

आंधियों! दश्त में तहज़ीब से दाखिल होना
पेड़ कोई भी समरदार न गिरने पाये

मैं निहत्थों पर कभी वार नहीं करता हूं
मेरे दुश्मन, तेरी तलवार न गिरने पाये

इसमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं
देखना, हाथ से अख़बार न गिरने पाये

मिलता-जुलता है सभी मांओं से मां का चेहरा
गुरुद्वारे की भी दीवार न गिरने पाये

जिस्म का बरसों पुराना ये खंडर गिर जाएगा

जिस्म का बरसों पुराना ये खंडर गिर जाएगा
आंधियों का ज़ोर कहता है शजर गिर जाएगा

हम तवक़्क़ो से ज़्यादा सख़्तजां साबित हुए
वो समझता था की पत्थर से समर गिर जाएगा

अब मुनासिब है कि तुम कांटों को दामन सौंप दो
फ़ूल तो ख़ुद ही किसी दिन सूखकर गिर जाएगा

मेरी गुड़िया-सी बहन को ख़ुदकुशी करना पड़
क्या ख़बर थी, दोस्त मेरा इस क़दर गिर जाएगा

इसीलिए मैंने बुजुर्गों की ज़मीनें छोड़ दीं
मेरा घर जिस दिन बसेगा, तेरा घर गिर जाएगा

जल रहे है धूप में लेकिन इसी सहरा में हैं

जल रहे है धूप में लेकिन इसी सहरा में हैं
क्या ख़बर वहशत को हम भी शहरे-कलकत्ता में हैं

हम हैं गुज़रे वक़्त की तहज़ीब के रौशन चराग़
फ़ख़्र कर अर्ज़े-वतन हम आज तक दुनिया में हैं

मछलियां तक ख़ौफ़ से दरिया किनारे आ गयीं
ये हमारा हौसला है हम अगर दरिया में हैं

हम को बाज़ारों की ज़ीनत के लिये तोड़ा गया
फ़ूल होकर भी कहां हम गेसू-ए-लैला में हैं

मेरे पीछे आने वालों को कहां मालूम है
ख़ून के धब्बे भी शामिल मेरे नक़्शे-पा में हैं

ऐब-जूई से अगर फुर्सत मिले तो देखना
दोस्तो! कुछ ख़ूबियां भी हज़रते-राना में हैं

मेरे कमरे में अंधेरा नही रहने देता

मेरे कमरे में अंधेरा नही रहने देता
आपका ग़म मुझे तनहा नहीं रहने देता

वो तो ये कहिए कि शमशीर-ज़नी आती थी
वरना दुश्मन हमें ज़िन्दा नही रहने देता

मुफ़लिसी घर में ठहरने नहीं देती हमको
और परदेस में बेटा नहीं रहने देता

तिश्नगी मेरा मुक़द्दर है इसी से शायद
मैं परिन्‍दों को भी प्यासा नहीं रहने देता

रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्‍या मालूम
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता

ग़म से लछमन की तरह भाई का रिश्ता है मेरा
मुझको जंगल में अकेला नहीं रहने देता

बिछड़ने वालों का अब इन्तज़ार क्या करना

बिछड़ने वालों का अब इन्तज़ार क्या करना
उड़ा दिये तो कबूतर शुमार क्या करना

हमारे हाथ में तलवार भी है, मौक़ा भी
मगर गिरे हुए दुश्मन पे वार क्या करना

वो आदमी है तो एहसासे-जुर्म काफ़ी है
वो संग है तो उसे संगसार क्या करना

बदन में ख़ून नहीं हो तो ख़ूंबहा कैसा
मगर अब इसका बयां बार-बार क्या करना

चरागे-आख़िरे-शब जगमगा रहा है मगर
चरागे-आख़िरे-शब का शुमार क्या करना

 

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