पीपल छाँव-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Peepal Chhanv part 2

पीपल छाँव-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Peepal Chhanv part 2

वो ग़ज़ल पढने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था

वो ग़ज़ल पढने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था
सिर्फ़ गज़लें नहीं, लहजा भी गज़ल जैसा था

वक़्त ने चेहरे को बख्शी हैं ख़राशें वरना
कुछ दिनों पहले ये चेहरा भी ग़ज़ल जैसा था

तुमसे बिछड़ा तो पसन्द आ गयी बेतरतीबी
इससे पहले मेरा कमरा भी ग़ज़ल जैसा था

कोई मौसम भी बिछड़ कर हमें अच्छा न लगा
वैसे पानी का बरसना भी ग़ज़ल जैसा था

नीम का पेड़ था, बरसात भी और झूला था
गांव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था

वो भी क्या दिन थे तेरे पांव की आहट सुन कर
दिल का सीने में धड़कना भी ग़ज़ल जैसा था

इक ग़ज़ल देखती रहती थी दरीचे से मुझे
सोचता हूं, वो ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था

कुछ तबीयत भी ग़ज़ल कहने पे आमादा थी
कुछ तेरा फूट के रोना भी ग़ज़ल जैसा था

मेरा बचपन था, मेरा घर था, खिलौने थे मेरे
सर पे मां-बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था

नर्म-ओ-नाज़ुक-सा, बहुत शोख़-सा, शर्मीला-सा
कुछ दिनों पहले तो ‘राना’ भी ग़ज़ल जैसा था

धंसती हुई क़ब्रों की तरफ़ देख लिया था

धंसती हुई क़ब्रों की तरफ़ देख लिया था
मां-बाप के चेहरों की तरफ़ देख लिया था

दौलत से मोहब्बत तो नहीं थी मुझे लेकिन
बच्चों ने खिलौनों की तरफ़ देख लिया था

उस दिन से बहुत तेज़ हवा चलने लगी है
बस, मैंने चरागों की तरफ़ देख लिया था

अब तुमको बुलन्दी कभी अच्छी न लगेगी
क्यों ख़ाकनशीनों की तरफ़ देख लिया था

तलवार तो क्या, मेरी नज़र तक नहीं उट्ठी
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था

ख़ुद सूख गया ज़ख़्म ने मरहम नहीं देखा

ख़ुद सूख गया ज़ख़्म ने मरहम नहीं देखा
इस खेत ने बरसात का मौसम नहीं देखा

इस कौम को तलवार से डर ही नहीं लगता
तुमने कभी ज़ंजीर का मातम नहीं देखा

शाख़े-दिले-सरसब्ज़ में फ़ल ही नहीं आये
आंखों ने कभी नींद का मौसम नहीं देखा

मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा

हम ख़ानाबदोशों की तरह घर में रहे हैं
कमरे ने हमारे कभी शीशम नहीं देखा

इस्कूल के दिन याद न आने लगें राना
इस ख़ौफ़ से हमने कभी अलबम नहीं देखा

इतना रोये थे लिपट कर दरो-दिवार से हम

इतना रोये थे लिपट कर दरो-दिवार से हम
शहर में आ के बहुत दिन रहे बीमार-से हम

अपने बिकने का बहुत दुख है हमें भी लेकिन
मुस्कुराते हुए मिलते हैं खरीदार से हम

संग आते थे बहुत चारों तरफ़ से घर में
इसलिए डरते हैं अब शाख़े-समरदार से हम

सायबां हो, तेरा आंचल हो कि छत हो लेकिन
बच नहीं सकते रुसवाई की बौछार से हम

रास्ता तकने में आंखें भी गवां दीं राना
फ़िर भी महरूम रहे आपके दीदार से हम

दश्तो-सहरा में कभी उजड़े खंडर में रहना

दश्तो-सहरा में कभी उजड़े खंडर में रहना
उम्र भर कोई न चाहेगा सफ़र में रहना

ऐ ख़ुदा, फ़ूल-से बच्चों की हिफ़ाज़त करना
मुफ़लिसी चाह रही है मेरे घर में रहना

इसलिए बठी है दहलीज़ पे मेरी बहनें
फ़ल नहीं चाहते ता-उम्र शजर में रहना

मुद्दतों बाद कोई शख़्स है आने वाला
ऐ मेरे आंसुओं, तुम दीद-ए-तर में रहना

किस को ये फ़िक्र कि हालात कहां आ पहुंचे
लोग तो चाहते हैं सिर्फ़ ख़बर में रहना

मौत लगती है मुझे अपने मकां की मानिंद
ज़िन्दगी जैसे किसी और के घर में रहना

हंसते हुए मां-बाप की गाली नहीं खाते

हंसते हुए मां-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

तुम से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन
तुम से न मिलेंगे, ये कसम भी नहीं खाते

सो जाते है फुटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद
जब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते

दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे क़लन्दर
हर एक के पैसों की दवा भी नहीं खाते

अल्लाह ग़रीबों का मददगार है राना
हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते

नये कमरों में अब चीज़ें पुरानी कौन रखता है

नये कमरों में अब चीज़ें पुरानी कौन रखता है
परिन्दों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है

कहीं भी इन दिनों मेरी तबीयत ही नहीं लगती
तेरी जानिब से दिल में बदगुमानी कौन रखता है

हमीं गिरती हुई दीवार को थामे रहे वरना
सलीक़े से बुज़ुगों की निशानी कौन रखता है

ये रेगिस्तान है चश्मा कहीं से फूट सकता है
शराफ़त इस सदी में ख़ानदानी कौन रखता है

हमीं भूले नहीं अच्छे-बुरे दिन आज तक वरना
मुनव्वर, याद माज़ी की कहानी कौन रखता है

ख़ुदा-न-ख़्वास्ता जन्नत हराम कर लेंगे

ख़ुदा-न-ख़्वास्ता जन्नत हराम कर लेंगे
मुनफ़िक़ों को अगर हम सलाम कर लेंगे

अभी तो मेरी ज़रूरत है मेरे बच्चों को
बड़े हुए तो ये ख़ुद इन्तज़ाम कर लेंगे

इसी ख़याल से हमने ये पेड़ बोया है
हमारे साथ परिन्दे क़याम कर लेंगे

फ़िर आंसुओं की ज़रूरत न चश्मे-तर को हुई

फ़िर आंसुओं की ज़रूरत न चश्मे-तर को हुई
हुई जब उससे जुदाई तो उम्र भर को हुई

तकल्लुफ़ात में ज़ख्मों को कर दिया नासूर
कभी मुझे कभी ताख़ीर चारागर को हुई

अब अपनी जान भी जाने का ग़म नहीं हमको
चलो, ख़बर तो किसी तरह बेख़बर को हुई

बस एक रात दरीचे में चांद उतरा था
कि फ़िर चराग़ की ख़्वाहिश न बामो-दर को हुई

किसी भी हाथ का पत्थर इधर नहीं आया
नदामत अब के बहुत शाख़े-बेसमर को हुई

हमारे पांव में कांटे चुभे हुए थे मगर
कभी सफ़र में शिकायत न हमसफ़र को हुई

मैं बे-पता लिखे ख़त की तरह था ऐ राना
मेरी तलाश बहुत मेरे नामाबर को हुई

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