पीपल-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

पीपल-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

कानन का यह तरूवर पीपल।
युग युग से जग में अचल,अटल।।
ऊपर विस्तृत,नभ नील,नील
नीचे वसुधा में नदी,झील।
जामुन,तमाल,इमली,करील
जल से ऊपर उठता मृणाल
फुनगी पर खिलता खिलता कमल लाल।
तिर तिर करते क्रीड़ा मराल।।
ऊँचे टीले से वसुधा पर
झरती है निर्झरणी झर झर ।
हो जाती बूँद बूँद झर कर।
निर्झर के पास खड़ा पीपल
सुनता रहता कलकल-छल छल।।
पल्लव हिलते ढलढल-ढलढल,
पीपल के पत्ते गोल गोल।
कुछ कहते रहते डोल डोल।।
जब जब आता पंछी तरू पर
जब जब जाता पंछी उड़ कर
जब जब खाता फल चुन चुन कर,
पड़ती जब पावस की फुहार
बजते जब पंछी के सितार।
बहने लगती शीतल बयार।।
तब तब कोमल पल्लव हिल डुल
गाते सर्सर,मर्मर मंजुल।
लख लख सुन सुन
विह्वहल बुल बुल।
बुलबुल गाती रहती चह चह
सरिता गाती रहती बह बह।।
पत्ते हिलते रहते रह रह।
जितने भी हैं इसमें कोटर
सब पंछी गिलहरियों के घर।।
संध्या को अब दिन जाता ढल
सूरज चलतें हैं अस्ताचल,
कर में समेंट किरणें उज्ज्वल ।।
हो जाता है सुनसान लोक
चल पड़ते घर को चील,कोक।
अंधियाली संध्या को विलोक।
भर जाता है कोटर कोटर
बस जातें हैं पत्तों के घर।
घर घर मेंआती नींद उतर,
निद्रा ही में होता प्रभात
कट जाती है इस तरह रात।
फिर यही बात रे वही बात,
इस वसुधा का यह वन्य प्रान्त,
है दूर, अलग अक्रान्त शान्त।
है खड़े जहाँ पर शाल,बाँस
चौपाये चरते नरम घास।
निर्झर,सरिता के आसपास।।
रजनी भर रो रो कर चकोर
कर देता है रे रोज भोर,
नाचा करतें हैं जहाँ मोर
,है जहाँ वल्लरी का बन्धन
बन्धन क्या,वह तो आलिंगन,
आलिंगन भीचिर आलिंगन ।
बुझती पथिकों की जहाँ प्यास
निद्रा लग जाती अनायास,
है वहीं सदा इसका निवास।।

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