पीत करना तो हम से निभाना सजन-नज़्में-इब्न-ए-इंशा -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ibn-e-Insha

पीत करना तो हम से निभाना सजन-नज़्में-इब्न-ए-इंशा -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ibn-e-Insha

पीत करना तो हम से निभाना सजन हम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन
तुम ही मजबूर हो हम ही मुख़्तार हैं ख़ैर माना सजन ये भी माना सजन

अब जो होने के क़िस्से सभी हो चुके तुम हमें खो चुके हम तुम्हें खो चुके
आगे दिल की न बातों में आना सजन कि ये दिल है सदा का दिवाना सजन

ये भी सच है न कुछ बात जी की बनी सूनी रातों में देखा किए चाँदनी
पर ये सौदा है हम को पुराना सजन और जीने का अपने बहाना सजन

शहर के लोग अच्छे हैं हमदर्द हैं पर हमारी सुनो हम जहाँ-गर्द हैं
दाग़-ए-दिल मत किसी को दिखाना सजन ये ज़माना नहीं वो ज़माना सजन

उस को मुद्दत हुई सब्र करते हुए आज कू-ए-वफ़ा से गुज़रते हुए
पूछ कर उस गदा का ठिकाना सजन अपने ‘इंशा’ को भी देख आना सजन

 

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