पासी जब लग मजब की, तबलग होत न ज्ञान-ज्ञान-वैराग्य कुण्डलियाँ-गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

पासी जब लग मजब की, तबलग होत न ज्ञान-ज्ञान-वैराग्य कुण्डलियाँ-गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

पासी जब लग मजब की, तबलग होत न ज्ञान।
मजब-पासि टूटे जबैं, पावे पद निर्वान॥
पावे पद निर्वान, निरंजन माहिं समावै।
जनम-मरन-भवचक्र, विषैं फिर योनि ना आवैं॥
कह गिरिधर कविराय, बांध बिन भ्रमैं चौरासी ।
तबलग होत न ज्ञान, मजब की जबलग पासी॥

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