पार्वती-महेश-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

पार्वती-महेश-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

ततखन पहुँचे आइ महेसू । बाहन बैल, कुस्टि कर भेसू ॥
काथरि कया हड़ावरि बाँधे । मुंड-माल औ हत्या काँधे ॥
सेसनाग जाके कँठमाला । तनु भभुति, हस्ती कर छाला ॥
पहुँची रुद्र-कवँल कै गटा । ससि माथे औ सुरसरि जटा ॥
चँवर घंट औ डँवरू हाथा । गौरा पारबती धनि साथा ॥
औ हनुवंत बीर सँग आवा । धरे भेस बादर जस छावा ॥
अवतहि कहेन्हि न लावहु आगी । तेहि कै सपथ जरहु जेहि लागी ॥

की तप करै न पारेहु, की रे नसाएहु जोग?।
जियत जीउ कस काढहु? कहहु सो मोहिं बियोग ॥1॥

 

कहेसि मोहिं बातन्ह बिलमावा । हत्या केरि न डर तोहि आवा ॥
जरै देहु, दुख जरौं अपारा । निस्तर पाइ जाउँ एक बारा ॥
जस भरथरी लागि पिंगला । मो कहँ पदमावति सिंघला ॥
मै पुनि तजा राज औ भोगू । सुनि सो नावँ लीन्ह तप जोगू ॥
एहि मढ़ सेएउँ आइ निरासा । गइ सो पूजि, मन पूजि न आसा ॥
मैं यह जिउ डाढे पर दाधा । आधा निकसि रहा, घट आधा ॥
जो अधजर सो विलँब न आवा । करत बिलंब बहुत दुख पावा!!

एतना बोल कहत मुख, उठी बिरह कै आगि ।
जौं महेस न बुझावत, जाति सकल जग लागि ॥2॥

 

पारबती मन उपना चाऊ । देखों कुँवर केर सत भाऊ ॥
ओहि एहि बीच, की पेमहि पूजा । तन मन एक, कि मारग दूजा ॥
भइ सुरूप जानहुँ अपछरा । बिहँसि कुँवर कर आँचर धरा ॥
सुनहु कुँवर मोसौं एक बाता । जस मोहिं रंग न औरहि राता ॥
औ बिधि रूप दीन्ह है तोकों । उठा सो सबद जाइ सिव-लोका ॥
तब हौं तोपहँ इंद्र पठाई । गइ पदमिनि तैं अछरी पाई ॥
अब तजु जरन, मरन, तप जोगू । मोसौं मानु जनम भरि भोगू ॥

हौं अछरी कबिलास कै जेहि सरि पूज न कोइ ।
मोहि तजि सँवरि जो ओहि मरसि, कौन लाभ तेहि होइ?॥3॥

 

भलेहिं रंग अछरी तोर राता । मोहिं दूसरे सौं भाव न बाता ॥
मोहिं ओहि सँवरि मुए तस लाहा । नैन जो देखसि पूछसि काहा?॥
अबहिं ताहि जिउ देइ न पावा । तोहि असि अछरी ठाढ़ि मनावा ॥
जौं जिउ देइहौं ओहि कै आसा । न जानौं काह होइ कबिलासा ॥
हौं कबिलास काह लै करऊँ?। सोइ कबिलास लागि जेहि मरऊँ ॥
ओहि के बार जीउ नहिं बारौं । सिर उतारि नेवछावरि सारौं ॥
ताकरि चाह कहै जो आई । दोउ जगत तेहि देहुँ बड़ाई ॥

ओहि न मोरि किछु आसा, हौं ओहि आस करेउँ ।
तेहि निरास पीतम कहँ, जिउ न देउँ का देउँ? ॥4॥

 

गौरइ हँसि महेस सौं कहा । निहचै एहि बिरहानल दहा ॥
निहचै यह ओहि कारन तपा । परिमल पेम न आछे छपा ॥
निहचै पेम-पीर यह जागा । कसे कसौटी कंचन लागा ॥
बदन पियर जल डभकहिं नैना । परगट दुवौ पेम के बैना ॥
यह एहि जनम लागि ओहि सीझा । चहै न औरहि, ओही रीझा ॥
महादेव देवन्ह के पिता । तुम्हरी सरन राम रन जिता ॥
एहूँ कहँ तसमया केरहू । पुरवहु आस, कि हत्या लेहू ॥

हत्या दुइ के चढ़ाए काँधे बहु अपराध ।
तीसर यह लेउ माथे, जौ लेवै कै साध ॥5॥

 

सुनि कै महादेव कै भाखा । सिद्धि पुरुष राजै मन लाखा ॥
सिद्धहि अंग न बैठे माखी । सिद्ध पलक नहिं लावै आँखी ॥
सिद्धहि संग होइ नहिं छाया । सिद्धहि होइ भूख नहिं माया ॥
जेहि गज सिद्ध गोसाईं कीन्हा । परगट गुपुत रहै को चीन्हा?॥
बैल चढ़ा कुस्टी कर भेसू । गिरजापति सत आहि महेसू ॥
चीन्हे सोइ रहै जो खोजा । जस बिक्रम औ राजा भोजा ॥
जो ओहि तंत सत्त सौं हेरा । गएउ हेराइ जो ओहि भा मेरा ॥

बिनु गुरु पंथ न पाइय, भूलै सो जो मेट ।
जोगी सिद्ध होइ तब जब गोरख सौं भेंट ॥6॥

 

ततखन रतनसेन गहबरा । रोउब छाँड़ि पाँव लेइ परा ॥
मातै पितै जनम कित पाला । जो अस फाँद पेम गिउ घाला?॥
धरती सरग मिले हुत दोऊ । केइ निनार कै दीन्ह बिछोऊ?॥
पदिक पदारथ कर-हुँत खोवा । टूटहि रतन, रतन तस रोवा ॥
गगन मेघ जस बरसै भला । पुहुमी पूरि सलिल बहि चला ॥
सायर टूट, सिखर गा पाटा । सूझ न बार पार कहुँ घाटा ॥
पौन पानि होइ होइ सब गिरई । पेम के फंद कोइ जनि परई ॥

तस रोवै जस जिउ जरै, गिरे रकत औ माँसु ।
रोवँ रोवँ सब रोवहिं सूत सूत भरि आँसु ॥7॥

 

रोवत बूड़ि उठा संसारू । महादेव तब भएउ मयारू ॥
कहेन्हि “नरोव, बहुत तैं रोवा । अब ईसर भा, दारिद खोवा ॥
जो दुख सहै होइ दुख ओकाँ । दुख बिनु सुख न जाइ सिवलोका ॥
अब तैं सिद्ध भएसि सिधि पाई । दरपन-कया छूटि गई काई ॥
कहौं बात अब हौं उपदेसी । लागु पंथ, भूले परदेसी ॥
जौं लगि चोर सेंधि नहि देई ।राजा केरि न मूसै पेई ॥
चढ़ें न जाइ बार ओहि खूँदी । परै त सेंधि सीस-बल मूँदी ॥

कहौं सो तोहि सिंहलगढ़, है खँड सात चढ़ाव ।
फिरा न कोई जियत जिउ सरग-पंथ देइ पाव ॥8॥

 

गढ़ तस बाँक जैसि तोरि काया । पुरुष देखु ओही कै छाया ॥
पाइय नाहिं जूझ हठि कीन्हे । जेइ पावा तेइ आपुहि चीन्हे ॥
नौ पौरी तेहि गढ़ मझियारा । औ तहँ फिरहिं पाँच कोटवारा ॥
दसवँ दुआर गुपुत एक ताका । अगम चड़ाव, बाट सुठि बाँका ॥
भेदै जाइ सोइ वह घाटी । जो लहि भेद, चढ़ै होइ चाँटी ॥
गढ़ँ तर कुंड, सुरँग तेहि माहाँ । तहँ वह पंथ कहौं तोहि पाहाँ ॥
चोर बैठ जस सेंधि सँवारी । जुआ पैंत जस लाव जुआरी ॥

जस मरजिया समुद धँस, हाथ आव तब सीप ।
ढूँढि लेइ जो सरग-दुआरी चड़ै सो सिंघलदीप ॥9॥

 

दसवँ दुआर ताल कै लेखा । उलटि दिस्टि जो लाव सो देखा ॥
जाइ सो तहाँ साँस मन बंधी । जस धँसि लीन्ह कान्ह कालिंदी ॥
तू मन नाथु मारि कै साँसा । जो पै मरहि अबहिं करु नासा ॥
परगट लोकचार कहु बाता । गुपुत लाउ कन जासौं राता ॥
“हौं हौं” कहत सबै मति खोई । जौं तू नाहि आहि सब कोई ॥
जियतहि जूरे मरै एक बारा । पुनि का मीचु, को मारै पारा?॥
आपुहि गुरू सो आपुहि चेला । आपुहि सब औ आपु अकेला ॥

आपुहि मीच जियन पुनि, आपुहि तन मन सोइ ।
आपुहि आपु करै जो चाहै, कहाँ सो दूसर कोइ? ॥10॥

 

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