पानी भरे हुए बादल-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

पानी भरे हुए बादल-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

पानी-भरे हुए भारी बादल से डूबा आसमान है
ऊँचे गुम्बद, मीनारों, शिखरों के ऊपर ।
निर्जन धूल-भरी राहों में
विवश उदासी फैल रही है ।
कुचले हुए मरे मन-सा है मौन नगर भी,
मज़दूरों का दूरी से रुकता स्वर आता
दोपहरी-सा सूनापन गहरा होता है
याद धरे बिछुड़न में खोये मेघ-मास में ।
भीगे उत्तर से बादल हैं उठते आते
जिधर छोड़ आये हम अपने मन का मोती
कोसों की इस-मेघ-भरी-दूरी के आगे
एक बिदाई की सन्ध्या में
छोड़ चांदनी-सी वे बाँहें
आँसू-रुकी मचलती आँखें।

भारी-भारी बादल उपर नभ में छाये
निर्जन राहों पर जिन की उदास छाया है
दोपहरी का सूनापन भी गहरा होता
याद-मरे बिछुड़न में डूबे इन कमरों में
खोयी-खोयी आँखों-सी खिड़की के बाहर
रुंधी हवा के एक अचानक झोंके के संग
दूर देश को जाती रेल सुनाई पड़ती !

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