पानी की चाल-धूपछाँह -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

पानी की चाल-धूपछाँह -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

सदी नाम के अंग्रेजी-कवि ने यह यश पाया है,
पानी का बहना कविता में जिन्दा दिखलाया है ।
उस रचना को देख एक दिन अकबर का मन डोला,
फिर बहाव पर उर्दू की ताकत को उनने तोला ।

बहुत क्रियापद जुटा दिखाया यह कौशल बानी का,
कैसा चित्र शब्द ले सकता है बहते पानी का ।
बहुत खूब है हुआ महाकवि अकबर का भी कहना,
पंक्ति-पंक्ति में जिन्दा उतरा है पानी का बहना ।

और आज है मुझे फिक्र यह, मैं भी कलम उठाऊँ,
हिन्दी की चौडी घाटी में दरिया एक बहाऊँ ।
लेकिन, कहाँ सदी औ’ अकबर ? और कहाँ मैं पोला ?
उसपर गजब, कला का अबतक चुस्त नहीं है चोला ।

रक्त-हीन जो कला पूजती केवल शब्द-चयन को,
कैसे बाँध सकेगी वह तूफाँ, आँधी, प्लावन को ?
उसपर मैं बहका-बहका-सा हूँ तन-मन से भारी,
कला-पारखी सच ही कहते कुछ-कुछ मुझे अनाड़ी ।

टेढ़ी-मेढ़ी चाल नदी की, और राह में रोड़े,
बिगड़ गयी तस्वीर कहीं, तो पीठ गिनेगी कोड़े ।
नयी लिखूं तो सदी और अकबर से भी डरता हूँ,
मगर खैर, कुछ हँसी-हँसी में ही कोशिश करता हूँ ।

माना मैं कुछ नहीं, कला भी नाजों की पाली है,
सब कुछ सही, मगर, हिन्दी-भाषा तो बलवाली है ।
अच्छा, मेरी कठिनाई की पूरी हुई कहानी,
अब देखिये, चला चोटी से उछल-कूदकर पानी ।

उठता-गिरता शोर मचाता, पत्थर पर सिर बुनता,
अपने ही गर्जन की चारों ओर प्रतिध्वनि सुनता ।
घबराता-सा, शिला-गोद से नीचे उछल उतरता,
फूल-फैलकर पल में घाटी की खाई को भरता ।
हा-हा करता, धूम मचाता, बल से अकड़ उबलता,
गर्ज-मान, पागल-सा मुंह से रह-रह झाग उगलता ।
चट्टानों के बीच साँप-सा टेढ़ी राह बनाता,
सरक-सरक चलता, पत्थर से जहाँ-तहाँ टकराता ।

अभी ठहर कर यहाँ फूलता, उठता, ऊपर चढ़ता,
अभी वहाँ ढालू पर से हो नीचे दौड़ उतरता ।
ताली दे आनन्द मचाता, गाता और बजाता,
गली हुई चाँदी को दिन की आभा में चमकता ।

इस पौधे का फूल चुराकर लहरों पर तैराता,
इसको एक थपेड़ा देता, उसको छेड़ चिढ़ाता ।
इस घाटी से अंग बचाता, उस घाटी से सटता,
फटता यहाँ, वहाँ सकुचाता, डरता, सिकुड़-सिमटता ।

यहाँ घनी झुरमुट में अपने को हर तरह छिपाता,
वहाँ निकल घासों पर उजली चादर-सी फैलाता ।
कहीं बर्फ की चट्टानों में निज को चित्रित करता,
कहीं किनारों के फूलों का बिम्ब हृदय में भरता ।

कंकड़ियों पर यहाँ दौड़ता, आगे पैर बढ़ाता,
वहाँ शाल-वन की छाया में ठहर जरा सुस्ताता ।
झुकी डालियों के पत्रों को छूता हुआ लहर से,
सुनता कूजित गीत विहग का झुरमुट के भीतर से ।

वन के लाखों जीव-जन्तुओं से परिचय दृढ़ करता,
सब की आँखें बचा भागता आगे उठता-गिरता ।
लहरों की फौजें असंख्य ले घहराता-हहराता,
देख दूर से ही रुकावटों पर बकता-चिल्लाता ।

लो, देखो, वह आ पहुँचा है गाता मस्त सुरों में,
कोलाहल करता खेतों, खलिहानों, गाँव-पुरों में ।
चौड़ी छाती फुला अकड़ता, अल्हड़ धूम मचाता,
छाता चारों ओर एक जल-थल का समां रचाता ।

जिधर उठाओ नजर, उधर है केवल पानी-पानी,
बाढ़ कहो तुम, मगर, यही है चढ़ती हुई जवानी ।
कोलाहल है, आर्त्तनाद है, है यह त्रास समाया,
हटो, बचो, अबकी यह पानी काल-सरीखा आया ।

और, काल-सा ही यह पानी चला जा रहा बढ़ता ।
देहली, दीवारों, ऊँचे टीले, छप्पर पर चढ़ता ।
हाँ, देखो, वह चला जा रहा लाखों को कलपाता,
खेत किसी का डुबो, किसी का छप्पर तोड़ बहाता ।

बड़े-बड़े बाँधों को टक्कर मार, तोड़ कर बहता,
अपने ही बल के वेगों से व्याकुल उमग उमहता ।
टोकों को अनसुनी किये-सा, रोकों से टकराता,
ताल ठोंक सब ओर जवानी के जौहर दिखलाता ।

मीलों तक मिट्टी कगार की काट उदर निज भरता,
बड़े-बड़े पेडों की जड़ पल में उत्पाटित करता ।
महाकाय जल-यानों को भंवरों में घेर नचाता,
बड़े-बड़े गजराजों को पत्तों की तरह बहाता ।

गीली मिट्टी लेप बदन में, बना हुआ दीवाना,
छाता बन कर नाच और गाता अलमस्त नराना ।
औढर दानी-सा नालों का घर बिन माँगे भरता,
और लुटेरे-सा किसान के हरे खजाने हरता ।

टीलों पर चढ़ने को हठयोगी-सा धुनी रमाता,
और नीच-सा खाई में गिर जाने को अकुलाता ।
गाँव, शहर, खलिहान, खेत को छूता, अलख जगाता,
चला जा रहा महापथिक-सा हंसता, रोता, गाता ।

देखो, गिरि से दूर सिन्धु-तक, जल की एक लड़ी है,
कहूँ कहाँ तक ! इस प्रवाह की महिमा बहुत बड़ी है ।
बहुत हुआ, अब आज खत्म करता हूँ यहीं कहानी,
गरचे अब भी उसी वेग से बहा जा रहा पानी ।

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