पहले तो डर लगा मुझे ख़ुद अपनी चाप से-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

पहले तो डर लगा मुझे ख़ुद अपनी चाप से-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

पहले तो डर लगा मुझे ख़ुद अपनी चाप से
फिर रो दिया मैं मिल के गले अपने आप से

देखा है हाँ उसे है वो कुछ मिलता जुलता सा
मुतरिब की मीठी मीठी सुरीली अलाप से

थी बात ही कुछ ऐसी कि दीवाना हो गया
दीवाना वर्ना बनता है कौन अपने आप से

रहना है जब हरीफ़ ही बन कर तमाम उम्र
क्या फ़ाएदा है यार फिर ऐसे मिलाप से

आया इधर ख़याल उधर मह्व हो गया
कहने को था न जाने अभी क्या मैं अपने आप से

हम और लगाएँ अपने पड़ोसी के घर में आग
भगवान ही बचाए हमें ऐसे पाप से

‘नौशाद’ रात कैसी थी वो महफ़िल-ए-तरब
लगती थी दिल पे चोट सी तबले की थाप से

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