पवनै महि पवनु समाइआ-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

पवनै महि पवनु समाइआ-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

पवनै महि पवनु समाइआ ॥
जोती महि जोति रलि जाइआ ॥
माटी माटी होई एक ॥
रोवनहारे की कवन टेक ॥१॥
कउनु मूआ रे कउनु मूआ ॥
ब्रहम गिआनी मिलि करहु बीचारा इहु तउ चलतु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अगली किछु खबरि न पाई ॥
रोवनहारु भि ऊठि सिधाई ॥
भरम मोह के बांधे बंध ॥
सुपनु भइआ भखलाए अंध ॥२॥
इहु तउ रचनु रचिआ करतारि ॥
आवत जावत हुकमि अपारि ॥
नह को मूआ न मरणै जोगु ॥
नह बिनसै अबिनासी होगु ॥३॥
जो इहु जाणहु सो इहु नाहि ॥
जानणहारे कउ बलि जाउ ॥
कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥
ना कोई मरै न आवै जाइआ ॥4॥10॥885॥

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