पल्लव -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

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पल्लव -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

छाया-काल

स्वस्ति, जीवन के छाया काल ।
सुप्त स्वप्नों के सजग सकाल !
मूक मानस के मुखर मराल !
स्वस्ति, मेरे कवि बाल !

तुम्हारा मानस था सोच्छ्वास,
अलस पलकों में स्वप्न विलास;
आँसुओं की आँखों में प्यास,
गिरा में था मधुमास !

बदलता बादल- सा नित वेश
तुम्हारा जग था छाया शेष;
निशा, अपलक नक्षत्रोन्मेष,
दिवस, छवि का परिवेश !

दिव्य हो भोला बालापन,
नव्य जीवन, पर, परिवर्तन,
स्वस्ति, मेरे अनंग नूतन !
पुरातन मदन दहन ।

(दिसम्बर, १९२५)

परिवर्तन

कहां आज वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?

कहां आज वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगंत-छबि-जाल,
ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?

राशि राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार
धरा पर करती थी अभिसार!

प्रसूनों के शाश्वत-शृंगार,
(स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार)
गूंज उठते थे बारंबार,
सृष्टि के प्रथमोद्गार!
नग्न-सुंदरता थी सुकुमार,
ॠध्दि औ’ सिध्दि अपार!

अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात?
दुरित, दु:ख-दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण-भ्रू-पात!

हाय ! सब मिथ्या बात !-

हाय ! सब मिथ्या बात !-
आज तो सौरभ का मधुमास
शिशिर में भरता सूनी साँस !

वही मधुऋतु की गुंजित डाल
झुकी थी जो यौवन के भार,
अकिंचनता में निज तत्काल
सिहर उठती, -जीवन है भार !
आज पावस नद के उद्गार
काल के बनते चिह्न कराल
प्रात का सोने का संसार;
जला देती संध्या की ज्वाल ।

अखिल यौवन के रंग उभार
हड्डियों के हिलते कंकाल;
कचों के चिकने, काले व्याल
केंचुली, कांस, सिवार;
गूँजते हैं सबके दिन चार,
सभी फिर हाहाकार !

आज बचपन का कोमल गात

आज बचपन का कोमल गात
जरा का पीला पात !
चार दिन सुखद चाँदनी राल
और फिर अन्धकार, अज्ञात !

शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल,
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल !

मृदुल होंठों का हिमजल हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर,
सरल भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर !

शून्य सांसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग;
मिलन के पल केवल दो, चार,
विरह के कल्प अपार !

अरे, ये अपलक चार-नयन
आठ-आँसू रोते निरुपाय;
उठे-रोओँ के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय !

 

किसी को सोने के सुख-साज

किसी को सोने के सुख-साज
मिल गये यदि ॠण भी कुछ आज,
चुका लेता दुख कल ही व्याज,
काल को नहीं किसी की लाज !

विपुल मणि-रत्नों का छबि-जाल,
इन्द्रधनु की-सी छटा विशाल-
विभव की विद्युत्-ज्वाल
चमक, छिप जाती है तत्काल;

मोतियों-जड़ी ओस की डार
हिला जाता चुपचाप बयार !

 

खोलता इधर जन्म लोचन,

खोलता इधर जन्म लोचन,
मूँदती उधर मृत्यु क्षण, क्षण;
अभी उत्सव औ’ हास-हुलास,
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास !

अचिरता देख जगत की आप
शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप,
ओस के आँसू नीलाकाश;

सिसक उठता समुद्र का मन
सिहर उठते उडगन !

अहे निष्ठुर परिवर्तन!

अहे निष्ठुर परिवर्तन!
तुम्हारा ही तांडव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन!
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन!
अहे वासुकि सहस्र फन!
लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर !
शत-शत फेनोच्छ्वासित,स्फीत फुतकार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर !
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर ,
अखिल विश्व की विवर,
वक्र कुंडल
दिग्मंडल !

अह दुर्जेय विश्वजित !

अह दुर्जेय विश्वजित !
नवाते शत सुरवर नरनाथ
तुम्हारे इन्द्रासन तल माथ;
घूमते शत-शत भाग्य अनाथ,
सतत रथ के चक्रों के साथ !
तुम नृशंस से जगती पर चढ़ अनियंत्रित ,
करते हो संसृति को उत्पीड़न, पद-मर्दित ,
नग्न नगर कर,भग्न भवन,प्रतिमाएँ खंडित
हर लेते हो विभव,कला,कौशल चिर संचित !
आधि,व्याधि,बहुवृष्टि,वात,उत्पात,अमंगल
वह्नि,बाढ़,भूकम्प,-तुम्हारे विपुल सैन्य दल;
अहे निरंकुश ! पदाघात से जिनके विह्वल
हिल-हिल उठता है टल-मल
पद-दलित धरातल !

जगत का अविरत ह्रतकंपन

जगत का अविरत ह्रतकंपन
तुम्हारा ही भय -सूचन ;
निखिल पलकों का मौन पतन
तुम्हारा ही आमंत्रण !
विपुल वासना विकच विश्व का मानस-शतदल
छान रहे तुम,कुटिल काल-कृमि-से घुस पल-पल;
तुम्हीं स्वेद-सिंचित संसृति के स्वर्ण-शस्य-दल
दलमल देते,वर्षोपल बन, वांछित कृषिफल !
अये ,सतत ध्वनि स्पंदित जगती का दिग्मंडल
नैश गगन-सा सकल
तुम्हारा ही समाधिस्थल !

काल का अकरुण मृकुटि विलास

काल का अकरुण मृकुटि विलास
तुम्हारा ही परिहास;
विश्व का अश्रु-पूर्ण इतिहास
तुम्हारा ही इतिहास ।

एक कठोर कटाक्ष तुम्हारा अखिल प्रलयकर
समर छेड़ देता निसर्ग संसृति में निर्भर;
भूमि चूम जाते अभ्र ध्वज सौध, श्रृंगवर,
नष्ट-भ्रष्ट साम्राज्य–भूति के मेघाडंबर !
अये, एक रोमांच तुम्हारा दिग्भू कंपन,
गिर-गिर पड़ते भीत पक्षि पोतों-से उडुगन;
आलोड़ित अंबुधि फेनोन्नत कर शत-शत फन,
मुग्ध भूजंगम-सा, इंगित पर करता नर्तन ।
दिक् पिंजर में बद्ध, गजाधिप-सा विनतानन,
वाताहत हो गगन
आर्त करता गुरु गर्जन ।

जगत की शत कातर चीत्कार

जगत की शत कातर चीत्कार
बेधतीं बधिर, तुम्हारे कान !
अश्रु स्रोतों की अगणित धार
सींचतीं उर पाषाण !

अरे क्षण-क्षण सौ-सौ नि:श्वास
छा रहे जगती का आकाश !
चतुर्दिक् घहर-घहर आक्रांति ।
ग्रस्त करती सुख-शांति !

 

हाय री दुर्बल भ्रांति ! –

हाय री दुर्बल भ्रांति ! –
कहाँ नश्वर जगती में शांति ?
सृष्टि ही का तात्पर्य अशांति !
जगत अविरत जीवन संग्राम,
स्वप्न है यहाँ विराम !

एक सौ वर्ष, नगर उपवन,
एक सौ वर्ष, विजन वन !
-यही तो है असार संसार,
सृजन, सिंचन, संहार !

आज गर्वोन्नत हर्म्य अपार,
रत्न दीपावलि, मंत्रोच्चार;
उलूकों के कल भग्न विहार,
झिल्लियों की झनकार !

दिवस निशि का यह विश्व विशाल
मेघ मारुत का माया जाल !

अरे, देखो इस पार-

अरे, देखो इस पार-
दिवस की आभा में साकार
दिगंबर, सहम रहा संसार !
हाय, जग के करतार !

प्रात ही तो कहलाई मात,
पयोधर बने उरोज उदार,
मधुर उर इच्छा को अज्ञात
प्रथम ही मिला मृदुल आकार;
छिन गया हाय, गोद का बाल,
गड़ी है बिना बाल की नाल !

अभी तो मुकुट बँधा था माँथ,
हुए कल ही हलदी के हाथ;
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले भी चुंबन शून्य कपोल:

हाय ! रुक गया यहीं संसार
बना सिंदूर अंगार !
वात हत लतिका यह सुकुमार
पड़ी है छिन्नाधार !!

कांपता उधर दैन्य निरुपाय,

कांपता उधर दैन्य निरुपाय,
रज्जु-सा, छिद्रों का कृश काय !
न उर में गृह का तनिक दुलार,
उदर ही में दानों का भार !

भूँकता सिड़ी शिशिर का श्वान
चीरता हरे ! अचीर शरीर;
न अधरों में स्वर, तन में प्राण,
न नयनों ही में नीर !

सकल रोओं से हाथ पसार

सकल रोओं से हाथ पसार
लूटता इधर लोभ गृह द्वार;
उधर वामन डग स्नेच्छाचार
नापता जगती का विस्तार !
टिड्डियों-सा छा अत्याचार
चाट जाता संसार !

कामनाओं के विविध प्रहार

कामनाओं के विविध प्रहार
छेड़ जगती के उर के तार,
जगाते जीवन की झंकार
रुफूर्ति करते संचार;

चूम सुख दुख के पुलिन अपार
छलकती ज्ञानामृत की धार !

पिघल होंठों का हिलता, हास
दृगों को देता जीवन दान,
वेदना ही में तपकर प्राण
दमक, दिखलाते स्वर्ण हुलास !

तरसते हैं हम आठोंयाम,
इसी से सुख अति सरस, प्रकाम;
झेलते निशि दिन का संग्राम,
इसी से जय अभिराम;

अलभ है इष्ट, अत: अनमोल,
साधना ही जीवन का मोल !

बिना दुख के सब सुख निस्सार,

बिना दुख के सब सुख निस्सार,
बिना आँसू के जीवन भार;
दीन दुर्बल है रे संसार,
इसी से दया, क्षमा औ’ प्यार !

आज का दुख, कल का आह्लाद,

आज का दुख, कल का आह्लाद,
और कल का सुख, आज विषाद;
समस्या स्वप्न गूढ़ संसार,
पूर्ति जिसकी उसपार
जगत जीवन का अर्थ विकास,
मृत्यु, गति क्रम का ह्रास !

हमारे काम न अपने काम,

हमारे काम न अपने काम,
नहीं हम, जो हम ज्ञात;
अरे, निज छाया में उपनाम
छिपे हैं हम अपरुप;
गंवाने आए हैं अज्ञात
गंवाकर पाते स्वीय स्वरूप !

जगत की सुंदरता का चाँद

जगत की सुंदरता का चाँद
सजा लांछन को भी अवदात,
सुहाता बदल, बदल, दिनरात,
नवलता हो जग का आह्लाद !

स्वर्ण शैशव स्वप्नों का जाल,

स्वर्ण शैशव स्वप्नों का जाल,
मंजरित यौवन, सरस रसाल;
प्रौढ़ता, छाया वट सुविशाल,
स्थविरता, नीरव सायंकाल;

वही विस्मय का शिशु नादान
रूप पर मँडरा, बन गुंजार,
प्रणय से बिंध, बँध, चुन-चुन सार,
मधुर जीवन का मधु कर पान;

एक बचपन ही में अनजान
जागते, सोते, हम दिनरात;
वृद्ध बालक फिर एक प्रभात
देखता नव्य स्वप्न अज्ञात;

मूंद प्राचीन मरण,
खोल नूतन जीवन ।

विश्वमय हे परिवर्तन !

विश्वमय हे परिवर्तन !
अतल से उमड़ अकूल, अपार
मेघ- से विपुलाकार,
दिशावधि में पल विविध प्रकार
अतल में मिलते तुम अविकार ।
अहे अनिर्वचनीय ! रूप पर भव्य, भयंकर,
इंद्रजाल सा तुम अनंत में रचते सुंदर;
गरज गरज, हँस हँस, चढ़ गिर, छा ढा भू अंबर,
करते जगती को अजस्र जीवन से उर्वर;
अखिल विश्व की आशाओं का इंद्रचाप वर
अहे तुम्हारी भीम मृकुटि पर
अटका निर्भर !

एक औ’ बहु के बीच अजान

एक औ’ बहु के बीच अजान
घूमते तुम नित चक्र समान,
जगत के उर में छोड़ महान
गहन चिन्हों में ज्ञान ।

परिवर्तित कर अगणित नूतन दृश्य निरंतर,
अभिनय करते विश्व मंच पर तुम मायाकर !
जहाँ हास के अधर, अश्रु के नयन करुणतर
पाठ सीखते संकेतों में प्रकट, अगोचर;
शिक्षास्थल यह विश्व मंच, तुम नायक नटवर,
प्रकृति नर्त्तकी सुघर
अखिल में व्याप्त सूत्रधर !

हमारे निज सुख, दुख, नि:श्वास

हमारे निज सुख, दुख, नि:श्वास
तूम्हें केवल परिहास;
तुम्हारी ही विधि पर विश्वास
हमारा चिर आश्वास !

ऐ अनंत हृत्कंप ! तुम्हारा अविरत स्पंदन
सृष्टि शिराओं में संचारित करता जीवन,
खोल जगत के शत- शत नक्षत्रों-से लोचन,
भेदन करते अंधकार तुम जग का क्षण-क्षण;
सत्य तुम्हारी राज यष्टि, सम्मुख नत त्रिभुवन,
भूप, अकिंचन,
अटल शास्ति नित करते पालन !

तुम्हारा ही अशेष व्यापार,

तुम्हारा ही अशेष व्यापार,
हमारा भ्रम, मिथ्याहंकार;
तुम्हीं में निराकार साकार,
मृत्यु जीवन सब एकाकार !

अहे महांबुधि ! लहरों-से शत लोक, चराचर,
क्रीडा करते सतत तुम्हारे रुफीत वक्ष पर;
तुंग तरंगों से शत युग, शत-शत कल्पाँतर
उगल, महोदर में विलीन करते तुम सत्वर;
शत सहस्र रवि शशि, असंख्य ग्रह, उपग्रह, उडुगण,
जलते बुझते हैं स्फुलिंग-से तुममें तत्क्षण;
अरे विश्व में अखिल, दिशावधि, कर्म वचन, मन,
तुम्हीं चिरंतन
अहे विवर्तन हीन विवर्तन !

(१९२४)

(यह कविता अभी अधूरी है)

 

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