पलाश गमलों में-कविता-पूर्णिमा वर्मन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Purnima Varman

पलाश गमलों में-कविता-पूर्णिमा वर्मन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Purnima Varman

बाँध दिया इसके विलास को
मुट्ठी में भर के विकास को
बैठक में इसको ले आया
बंधन में रख के क्या पाया
जो खिलता है मुक्त गगन में
उसको
बात बात में टोके

छाया मिले न रंग फाग के
मौसम सूने गए बाग के
अब न जंगलों खिलती आग
कैसे उठे दिलों में राग
स्वारथ हवस चढ़ा आँखों पर
अब क्या
खड़ा बावरा सोचे

नवता नए व्याकरण खोले
परंपरा के उठे खटोले
आभिजात्य की नई दुकान
बोनसाई के ऊँचे दाम
हम चुप पड़े देखते ऐसे
जैसे हों
कागज के खोखे

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