परी का सरापा-नारी श्रृंगार-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

परी का सरापा-नारी श्रृंगार-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

खूंरेज़करिश्मा, नाज़ो सितम, गम़जों की झुकावट वैसी ही।
मिज़गाँ की सनां, नज़रों की अनी अबरू की खिंचावट वैसी ही॥
क़त्ताल निगाह और दिष्ट ग़जब आंखों की लगावट वैसी ही।
पलकों की झपक, पुतली की फिरत, सुर्मे की लगावट वैसी ही॥
अय्यार नज़र, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही॥1॥

बेदर्द, सितमगर, बेपरवा, बेकल, चंचल, चटकीली सी।
दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी॥
आनों की बान हटीली सी, काजल की आंख कटीली सी।
वह अंखियां मस्त नशीली सी कुछ काली सी कुछ पीली सी॥
चितवन की दग़ा, नज़रों की कपट, सैनों की लड़ावट वैसी ही॥2॥

थी खूब अदा से सर ऊपर संजाफ दुपट्टे की उल्टी।
बलदार लटें, तस्वीर जबीं जकड़ी मेंढ़ी, नीची कंघी॥
दिल लोट न जावे अब क्योंकर, और देख न उलझे कैसे जी।
वह रात अंधेरी बालों की, वह मांग चमकती बिजली सी॥
जुल्फों की खुलत, पट्टी की जमत, चोटी की गुंधावट वैसी ही॥3॥

उस काफ़िर बीनी और नथ के अन्दाज़ क़यामत शान भरे।
और गहरे चाहे ज़नखन्दाँ में, सौ आफ़त के तूफान भरे॥
वह नर्मो साफ़ सितारा से और मोती से दामान भरे।
वह कान जवाहरकान भरे कन फूलों, बाले जान भरे॥
बुन्दों की लटक, झुमकों की झमक, बाले की हिलावट वैसी ही॥5॥

चेहरे पर हुस्न की गर्मी से हर आन झमकते मोती से।
ख़ुशरंग पसीने की बूंदें, सौ बार झमकते मोती से॥
हँसने की अदा में फूल झड़ें, बातों में टपकते मोती से।
वह पतले पतले होंठ ग़जब वह दांत चमकते मोती से॥
पानों की रंगावट क़हर सितम, धड़ियों की जमावट वैसी ही॥5॥

उस सीने का वह चाक सितम, उस कुर्ती का तनजे़ब ग़जब।
उस क़द की ज़ीनत क़हर बला उस काफ़िर छवि का ज़ेब ग़जब॥
उन डिबियों का आज़ार बुरा, उन गेंदों का आसेब ग़जब।
वह छोटी छोटी सख़्त कुचें, वह कच्चे कच्चे सेब ग़जब॥
अंगिया की भड़क, गोटों की झमक, बुन्दों की कसावट वैसी ही॥6॥

थी पहने दोनों हाथों में काफ़िर जो कड़े गंगा जमुनी।
कुछ शोख़ कड़ों की झनकारें, कुछ झनके चूड़ी बाहों की॥
यह देख के आलम आशिक़ का सीने में न तड़पे क्यूं कर जी।
वह पतली पतली अंगुश्तें, पोरें वह नाजुक नाजुक सी॥
मेंहदी की रँगत, फ़न्दक की बनत, छल्लों की छलावट वैसी ही॥7॥

तक़रीर बयां से बाहर है, वह काफ़िर हुस्न, अहा! हा! हा!।
कुछ आप नई कुछ हुस्न नया, कुछ जोश जवानी उठती का॥
लपकें, झपकें उन बाहों की यारों मैं आह! कहूं क्या-क्या।
वह बांके बाजू होशरुबा आशिक़ से खेले बांक पटा॥
पहुंची की पहुंच, पहुंचे पै ग़जब, बांकों की बंधावट वैसी ही॥8॥

वह काफ़िर धज, जी देख जिसे सौ बार क़यामत का लरजे।
पाजेब,कड़े, पायल, घुंघरू, कड़ियां, छड़ियां, गजरे, तोड़े॥
हर जुम्बिश में सौ झंकारें, हर एक क़दम पर सौ झमके।
वह चंचल चाल जवानी की, ऊंची एड़ी नीचे पंजे॥
कफ़्शों की खटक, दामन की झटक, ठोकर की लगावट वैसी ही॥9॥

एक शोरे क़यामत साथ चले, निकले काफ़िर जिस दम बन ठन।
बलदार कमर रफ़्तार ग़जब, दिल की क़ातिल जी की दुश्मन॥
मज़कूर करूं मैं अब यारों उस शोख के क्या क्या चंचलपन।
कुछ हाथ हिलें कुछ पांव हिलें, फड़कें बाजू थिरके सब तन॥
गाली वह बला, ताली वह सितम, उंगली की नचावट वैसी ही॥10॥

यह होश क़यामत काफ़िर का, जो बात कहो वह सब समझे।
रूठे, मचले, सौ स्वांग करे, बातों में लड़े, नज़रों से मिले॥
यह शोख़ी फुर्ती बेताबी एक आन कभी निचली न रहे।
चंचल अचपल मटके चटके, सर खोले ढांके हँस-हँस के॥
कहकह की हंसावट और ग़ज़ब, ठट्ठों की उड़ावट वैसी ही॥11॥

कोहनी मारे, चुटकी लेले छेड़े, झिड़के, देवे गाली।
हर आन ‘चे खु़श’ हर दम ‘अच्छा’, हर बात खु़शी की चुहल भरी॥
नज़रों में साफ़ उड़ाले दिल, इस ढब की काफ़िर अय्यारी।
और हट जावे सौ कोस परे, गर बात कहो कुछ मतलब की॥
रम्ज़ो के ज़िले, गम्जों की जुगत, ठट्ठो की उड़ावट वैसी ही॥12॥

कातिल हर आन नये आलम, काफ़िर हर आन नई झमकें।
बाँकी नज़रें तिरछी, पलकें, भोली सूरत, मीठी बातें॥
दिल बस करने के लाखों ढब, जी लेने की सौ सौ घातें।
हर वक़्त फ़बन, हर आन सजन, दम दम में बदले लाख धजें॥
बाहों की झमक, घूंघट की अदा, जोबन की दिखावट वैसी ही॥13॥

जो उस पर हुस्न का आलम है, वह आलम हूर कहां पावे।
गर पर्दा मुंह से दूर करे, खुर्शीद को चक्कर आ जावे॥
जब ऐसा हुस्न भभूका हो, दिल ताब भला क्यूंकर लावे।
वह मुखड़ा चांद का टुकड़ा, सा जो, देख परी को गश आवे॥
गालों की दमक, चोटी की झमक रंगों की खिलावट वैसी ही॥14॥

तस्वीर का आलम नख सिख से छब तख्ती साफ़ परी की सी।
कुछ चीने जबीं पर ऐंठ रही और होंठों में कुछ गाली सी॥
बेदर्दी सख़्ती बहुतेरी; और मेहरों मुहब्बत थोड़ी सी।
झूठी अय्यारी नाक चढ़ी, भोली भाली पक्की बीसी॥
बातों की लगावट क़हर सितम, नज़रों की मिलावट वैसी ही॥15॥

कुछ नाज़ो अदा कुछ मग़रूरी, कुछ शर्मो हया कुछ बांकपना।
कुछ आमद हुस्न के मौसम की, कुछ काफिरजिस्म रहा गदरा॥
कुछ शोर जवानी उठती का चढ़ता है घमंड कर जूं दरिया।
वह सीना उभरा जोश भरा, वह आलम जिसका झूम रहा॥
शानो की अकड़, जोबन की तकड़, सज धज की सजावट वैसी ही॥16॥

यह काफिर गुद्दी का आलम घबराये परी भी देख जिसे।
वह गोरा साफ गला ऐसा, वह जावे मोती देख जिसे॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले, और ग़श खावे जी देख जिसे।
वह गर्दन ऊंची हुस्न भरी, कट जाय सुराही देख जिसे॥
दायें की मुड़त बायें की फिरत, मोढ़ों की खिंचावट वैसी ही॥17॥

इस गोरे नाजुक सीने पर वह गहने के गुलज़ार खिले।
चंपे की कली, हीरे की जड़ी तोड़े जुगनू हैकल बद्धी॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले और जाय नज़र हर दम फिसली।
वह पेट मलाई सा काफ़िर वह नाफ़ चमकती तारा सी॥
शोख़ी की खुलावट और सितम शर्मो की छिपावट वैसी ही॥18॥

हर आन निराली हर इक से उस शोख़ परी की महबूबी।
कुछ नाज़ो अदा की मरगूबी कुछ शर्मो हया की महबूबी॥
अब गहने की तारीफ करूँ या काफ़िर जोड़े की खूबी।
पोशाक सुनहरी इत्र भरी सर पाँव जवाहर में डूबी॥
जुगनू की दमक, हीना की सफा, कुर्ती की फँसावट वैसी ही॥19॥

जब ऐसा हुस्न का दरिया हो किस तौर न लहरों में बहिए।
गर मेहरो मुहब्बत हो भीतर और जोरो जफ़ा हो तो सहिए॥
दिल लोट गया है ग़श खाकर बस और तो आगे क्या कहिए।
मिल जाय “नज़ीर” ऐसी जो परी छाती से लिपट कर सो रहिए॥
बोसों की चपक, बग़लों की लपक, सीनों की मिलावट वैसी ही॥20॥

 

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