पराजय भी फिर जय है-बादर बरस गयो-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

पराजय भी फिर जय है-बादर बरस गयो-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

भुलुंठित भूजचक्र, किरीट, कवच, कल कुंडल,
टूक-टूक तूणीर, खंड कोदण्ड, दण्ड-बल,
श्रीहत शयित धरायित सैन्य सनी शोणित में,
क्षत-विक्षत शिर-वक्ष, न कोई साथी-सम्बल,
पर जब तक लालसा समर की शेष रक्त में,
हार – हार यह नहीं, विजय ही अमर अभय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

अर्घ्य नहीं, आरती नहीं, हो नहीं अर्चना,
कर्म नहीं, साधना नहीं, हो नहीं वन्दना,
ध्यान नहीं, धारणा नहीं, हो नहीं देवता,
फूल न चन्दन, भोग न पूजा, नहीं प्रार्थना,
पूजा की भावना पुजारी में पर जब तक,
झुके जहाँ भी शीश यहीं तो देवालय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

सुप्त सितारे, चाँद, गगन, भू, सुप्त दिशायें,
सुप्त विजन वन, सुप्त पात, द्रुम, सुप्त हवायें,
सपनों के जादूघर में खो गई पुतलियाँ,
सुप्त प्रणय के गान, प्राण की सुप्त व्यथायें,
पर जब तक छल रहा चकोरी को शशि निष्ठुर
यह निंद्रालस-रास जागरण का अभिनय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

धू-धू जलती धरा उगलती आग-अंगारे,
ताप-त्रस्त नभ, खौल रहे सरि-सागर सारे,
पीत पात रूखे-सूखे तरु, नंगी डालें,
फूल, कली, मधु, गंध न, मधुकर दूर सिधारे,
बुलबुल के दिल में पर जब तक याद चमन की
यह पतझर तूफ़ान मदिर मधुवात मलय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

शब्द न भाषा भाव, न छन्द बन्द का बन्धन,
काव्य – कल्पना नहीं, कला का नहीं प्रदर्शन,
ज्ञात नहीं स्वर-ताल, ज्ञान भी नहीं राग का,
नहीं साधना, नहीं शास्त्र का अध्ययन मन्थन,
पर जब तक तुम मेरे गीतों को गाती हो
मेरे गीतों का प्रति-प्रति अक्षर अक्षय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

यह कैसा आश्चर्य कि युग-व्यापी जीवन का
थामे कर में सूत्र इशारा केवल मन का?
इतनी बहीं धरा पर संचालित ऋतु से बस ?
एक क्षुद्र – सा फूल रूप सारे उपवन का ?
एक बूँद ही तो समुद्र की गहराई है,
एक सत्य ही तो सौ सपनों का आश्रय है।
यदि मन अजित-अजेय, पराजय भी फिर जय है।

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