परवर्ती-प्रभाव-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड एक-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar 

परवर्ती-प्रभाव-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड एक-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

स्थान : एक युद्ध हुआ चौराहा।
दृश्य : वहाँ फूटे हुए ढोलों की चुप्पी :
लोगों की चिल्लाहट, मौन,
रक्तस्राव !
लड़ना नहीं
गर्दन झुकाए हुए पास से गुज़र जाना-;
परस्पर बधिर-भाव,
गहन शान्ति !

ध्वनि : उस अंधेरे में
वाण-विद्ध पंछी की
कातर पुकारती-सी कोई आवाज़,
बुझे लैम्पपोस्ट की चिमनियों के
पास फड़फड़ाती, पंख मारती-सी कोई आवाज़,
अनसुनी, अनुत्तरित, उपेक्षित किन्तु
दूर तक गुहारती-सी कोई आवाज़ !

अर्थ : मुझे लगता है मुझमें से आती है,
लगता है मुझसे टकराती है !
आह !
छोटी-सी उम्र में देखे हुए
किसी नाटक की छोटी-सी स्थिति वह
अब तक मुझमें
मौक़े-बेमौक़े जी जाती है ।

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