परमाणु के ख़िलाफ़-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

परमाणु के ख़िलाफ़-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

यह कोई जंग नहीं थी
सोए शहरों में
जागते सपनों के ख़िलाफ़।
सदैव के वैर का शिखर था।
नस्लकुशी की गिनी-गुथी साज़िश थी।
नागासाकी न हिरोशिमा मिटा
लाशें और मलबा लट लट जला
फिर से जागा जापान।

दैत्य की छाती पर चढ़ बैठा और गरजा!
अब बोल!
हम जिंदा हम जागते।
हमारे बिन
एक कदम चल कर दिखा।
तेरी नब्ज़ अब हमारे हाथ में है
बड़के अहंकारिए!

तेरे पास सरमाया है।
हमारे पास सिर हैं।
निरंतर जागते, सोचते,
चलते सपने हैं।
तेरे पास सिर्फ़
मौत का बेइंतिहा सामान है
और बता?
तेरे पास क्या है हैकड़बाज़!

मौत की पुड़िया बेचता है
गली गली मुहल्ले मुहल्ले सहम कर
बच्चे छिप जाते हैं
तेरा कुद्रूप चेहरा देख कर।
आदमखोर!
तेरी कोई नहीं प्रतीक्षा करता।
दो बार दाँत गड़ाए हैं तूने हमारे
दुधमुँहे बच्चों, मासूम बचपन की मुस्कानों पर।

आतिशबाज़ !
तूने मासूम फाख़्ताओं के घोसले को
अंडों, बच्चों, उड़ानों समेत
अग्निभेंट किया है
सद्य कोंपलित पातों, अंकुरों को
मटियामेट किया है।
भाँति कुभाँति के हथियार
रक्त-नद में तैरते फिरते
लानत है ज़ालिम मछेरे!
जाल में मुल्कों के मुल्क फँसाता
अपनी दग्ध भाषा पढ़ाता सिखाता
विपरीत राह में डालता।

परमाणु की छाँव में
प्राणी परिंदे नहीं बैठते।
मौत ही तांडव नृत्य करती है
दौलतों के अहंकारित अंबार
किसी के लिए अन्न का कौर नहीं
भय का मुकाम बनते हैं।

पहले तू फौज़ें चढ़ाता था
तो सरहदें काँपती थीं।
अब पूरा ग्लोब काँपता है।
परमाणु के अहंकार में अंधा मस्ताया हाथी है।

बेलगाम घोड़ा सपने लताड़ता
पवन में भर देता है
मौत का ज़हरीला सामान
गेहूँ के दाने में लगे कीट-सी
सो जाती है कायनात
तुझे चितवते।

तूने ही छितराए थे सुबह तड़के
स्कूली बच्चों के बस्ते।
कामगारों के दोपहरवाली रोटी के डिब्बे।
चौके में गूँथे आटे में ज़हर डाला।
उड़ाए कोठार सहित अन्न भंडार।

हवा में उड़ाए थे परखच्चे करके तुंबे।
सूरज ने सुना तेरी रावणी हँसी।
देखा तेरा जब्र और धरती का सब्र।

माथे पर कालिख का टीका,
सदियों तक नहीं पड़ता फीका।
लानतिए!
मारक राग गाते
अंबर में चीलें घूमतीं
उड़नखटोला बन कर।

जापान को छोड़,
पूरा विश्व नहीं भूला आज तक
मौत का जब प्रलयंकर अंडा फूटा
बिछ गया शोक पूरी धरती पर
अंबर काला स्याह पड़ा
दर्दमंदों की आहों से।

पिघल गए समूचे शहर
झाँवा पत्थर हो गए।
पर पुनः जागे
जगे और प्रकाशस्तंभ बनें
तेरे सामने कलमुँहे!

तुझे भ्रम था,
लाशों के अंबार देख डोल जाएँगे
पहाड़ जैसे हौसले।
तू फिर भभका, बरसा तेज़ाब
मौत फिर घर घर घूमी,
जीवित जीव तलाशती।
हार गई मौत बुलंद हौसले के द्वार।
लोहा पिघल कर फौलाद बना
लोहे के मर्द बने सिरजनहार।
पिघली जानें इतिहास की किताब बनीं।

मुँह मुँह न रहे
नाक उधड़ कर विकृत हुई
ख़ून नसों में तेज़ दौड़ा
पहले से बहुत तेज़!
आँखें चमकीं
माथे का तीसरा नेत्रा प्रचंड हुआ।

परमाणु युद्ध के पहले पन्ने ने,
सबक दिया पूरे ब्रह्मांड को।
पिकासो के चित्र वाली
फाख़्ता के चोंच में पकड़ी जैतून की पत्ती,
न मुरझाए कभी।
वह ज़ालिम मौत का उड़नखटोला
लौट कर आए न कभी।

 

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