पद-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

पद-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

पद

तातैं ना कछू रे संसारा । मेरै रांम को नांव अधारा ॥टेक॥
गुड़ चींटा गुड़ षायी । गुड़ माहिं रही लपटायी ॥
गुड़ रती एक मीठा होई । पाछै दुष पावै सोई ॥
सुपनांतर राजा होइए। नांनां बिधि के सुष लहिए ॥
ऐसा सुष कों सुष होई । जाग्या थैं झूठा सोई ॥
मैं मेरी ग्यांन नसावै । तातैं आत्म समाधि न पावै ॥
रामानंद गुर गमि गावै । तातै भिन भिन समझावै ॥ ३ ॥

 पद

सहजैं सहजैं सब गुन जाइला । भगवंत भगता एक थिर थाइला ॥
मुक्ति भईला जाप जपीला । यों सेवग स्वामी संग रहीला ॥
अमृत सुधानिधि अंत न पाइला । पीवत प्रान न कदे अघाइला ॥
रामानंद मिलि संग रहैला । जब लग रस तब लग पीवैला ॥४॥

पद

…….लांबी को अंग,
कहां जाइसे हो घरि लागो रंग । मेरो चित न चलै मन भयो अपंग ॥
जहाँ जाइये तहाँ जल पपांन । पूरि रहे हरि सब समांन ॥
वेद सुमृत सब मेले जोइ । उहाँ जाइए हरि इहाँ न होइ ॥
एक बार मन भयौ उमंग । घसि चोबा चंदन चरि अंग ॥
पूजन चाली ठांइ ठांइ । सो ब्रह्म बतायौ गुरु आप माइं ॥
सतगुर मैं बलिहारी तोर । सकल विकल भ्रम जारे मोर ॥
‘रामानंद’ रमैं एक ब्रह्म । गुर कै एक सबदि काटे कोटि क्रम्म ॥५॥

(उपरोक्त पद थोड़े अंतर के साथ गुरू ग्रंथ साहिब में
बसंत राग में दर्ज है)

पद

सहज सुन्न मैं चिति वसंत । अबहि असहि जिनि जाय अंत ॥
न तहाँ इंच्छया ओं अंकार । न तहाँ नाभि न नालि तार ॥
न तहां ब्रह्मा स्यौ बिसन । न तहां चौबीसू बप बरन ॥
न तहाँ दीसै माया मंड । ‘रामानंद’ स्वामी रमैं अषंड ॥६॥

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