पदावली -संत रविदास जी( रैदास जी)-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sant Ravidas Ji Padawali Part 5

पदावली -संत रविदास जी( रैदास जी)-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sant Ravidas Ji Padawali Part 5

त्यू तुम्ह कारन केसवे, लालचि जीव लागा

त्यू तुम्ह कारन केसवे, लालचि जीव लागा।
निकटि नाथ प्रापति नहीं, मन मंद अभागा।। टेक।।
साइर सलिल सरोदिका, जल थल अधिकाई।
स्वांति बूँद की आस है, पीव प्यास न जाई।।१।।
जो रस नेही चाहिए, चितवत हूँ दूरी।
पंगल फल न पहूँचई, कछू साध न पूरी।।२।।
कहै रैदास अकथ कथा, उपनषद सुनी जै।
जस तूँ तस तूँ तस तूँ हीं, कस ओपम दीजै।।३।।

 त्यूँ तुम्ह कारनि केसवे, अंतरि ल्यौ लागी

त्यूँ तुम्ह कारनि केसवे, अंतरि ल्यौ लागी।
एक अनूपम अनभई, किम होइ बिभागी।। टेक।।
इक अभिमानी चातृगा, विचरत जग मांहीं।
जदपि जल पूरण मही, कहूं वाँ रुचि नांहीं।।१।।
जैसे कांमीं देखे कांमिनीं, हिरदै सूल उपाई।
कोटि बैद बिधि उचरैं, वाकी बिथा न जाई।।२।।
जो जिहि चाहे सो मिलै, आरत्य गत होई।
कहै रैदास यहु गोपि नहीं, जानैं सब कोई।।३।।
(राग रामकली)

देवा हम न पाप करंता

देवा हम न पाप करंता।
अहो अंनंता पतित पांवन तेरा बिड़द क्यू होता।। टेक।।
तोही मोही मोही तोही अंतर ऐसा।
कनक कुटक जल तरंग जैसा।।१।।
तुम हीं मैं कोई नर अंतरजांमी।
ठाकुर थैं जन जांणिये, जन थैं स्वांमीं।।२।।
तुम सबन मैं, सब तुम्ह मांहीं।
रैदास दास असझसि, कहै कहाँ ही।।३।।

 देहु कलाली एक पियाला

देहु कलाली एक पियाला।
ऐसा अवधू है मतिवाला।। टेक।।
ए रे कलाली तैं क्या कीया,
सिरकै सा तैं प्याला दीया।।१।।
कहै कलाली प्याला देऊँ,
पीवनहारे का सिर लेऊँ।।२।।
चंद सूर दोऊ सनमुख होई,
पीवै पियाला मरै न कोई।।३।।
सहज सुनि मैं भाठी सरवै,
पीवै रैदास गुर मुखि दरवै।।४।।
(राग आसा)

न बीचारिओ राजा राम को रसु

न बीचारिओ राजा राम को रसु।
जिह रस अनरस बीसरि जाही।। टेक।।
दूलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेके।
राजे इन्द्र समसरि ग्रिह आसन बिनु हरि भगति कहहु किह लेखै।।१।।
जानि अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाही।
इन्द्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नहीं।।२।।
कहीअत आन अचरीअत आन कछु समझ न परै अपर माइआ।
कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ।।३।।
(राग सोरठी)

 नरहरि चंचल मति मोरी

नरहरि चंचल मति मोरी।
कैसैं भगति करौ रांम तोरी।। टेक।।
तू कोहि देखै हूँ तोहि देखैं, प्रीती परस्पर होई।
तू मोहि देखै हौं तोहि न देखौं, इहि मति सब बुधि खोई।।१।।
सब घट अंतरि रमसि निरंतरि, मैं देखत ही नहीं जांनां।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, क्रित उपगार न मांनां।।२।।
मैं तैं तोरि मोरी असमझ सों, कैसे करि निसतारा।
कहै रैदास कृश्न करुणांमैं, जै जै जगत अधारा।।३।।

 नरहरि प्रगटसि नां हो प्रगटसि नां

नरहरि प्रगटसि नां हो प्रगटसि नां।
दीनानाथ दयाल नरहरि।। टेक।।
जन मैं तोही थैं बिगरां न अहो, कछू बूझत हूँ रसयांन।
परिवार बिमुख मोहि लाग, कछू समझि परत नहीं जाग।।१।।
इक भंमदेस कलिकाल, अहो मैं आइ पर्यौ जंम जाल।
कबहूँक तोर भरोस, जो मैं न कहूँ तो मोर दोस।।२।।
अस कहियत तेऊ न जांन, अहो प्रभू तुम्ह श्रबंगि सयांन।
सुत सेवक सदा असोच, ठाकुर पितहि सब सोच।।३।।
रैदास बिनवैं कर जोरि, अहो स्वांमीं तोहि नांहि न खोरि।
सु तौ अपूरबला अक्रम मोर, बलि बलि जांऊं करौ जिनि और।।४।।

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