पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 7

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 7

घर आंगण न सुहावै

घर आंगण न सुहावै, पिया बिन मोहि न भावै॥
दीपक जोय कहा करूं सजनी, पिय परदेस रहावै।
सूनी सेज जहर ज्यूं लागे, सिसक-सिसक जिय जावै॥
नैण निंदरा नहीं आवै॥
कदकी उभी मैं मग जोऊं, निस-दिन बिरह सतावै।
कहा कहूं कछु कहत न आवै, हिवड़ो अति उकलावै॥
हरि कब दरस दिखावै॥
ऐसो है कोई परम सनेही, तुरत सनेसो लावै।
वा बिरियां कद होसी मुझको, हरि हंस कंठ लगावै॥
मीरा मिलि होरी गावै॥

गोविन्द गाढ़ा छौजी, दीलरा मिंत

गोविन्द गाढ़ा छौजी, दीलरा मिंत।।टेक।।
वार निहारूँ पथ बुहारूँ, ज्यूँ सुष पावै चित।
मेरे मन की तुमही जानौ, मेरो ही जीव नीचिन्त।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पूरब जनम को कंत।।

गिरधारी शरणां थारी आयाँ

गिरधारी शरणां थारी आयाँ, राख्याँ किर्पानिधान।।टेक।।
अजामील अपराधी तार्यां तार्या नीच सदाण।
डूबतां गजराज राख्याँ गणिका चढ़्या बिमाण।
अवर अधम बहुत थें तार्या, भाख्याँ सणत सुजाण।
भीलण कुबजा तार्यां गिरधर, जाण्याँ सकल जहाण।
बिरद बखाणाँ गणतां जा जाणा, थाकाँ वेद पुराण।
मीराँ प्रभु री शरण रावली, बिणता दीस्यो काण।।

खबर मोरी लेजारे बंदा

खबर मोरी लेजारे बंदा जावत हो तुम उनदेस॥
हो नंदके नंदजीसु यूं जाई कहीयो। एकबार दरसन दे जारे॥१॥
आप बिहारे दरसन तिहारे। कृपादृष्टि करी जारे॥२॥
नंदवन छांड सिंधु तब वसीयो। एक हाम पैन सहजीरे।
जो दिन ते सखी मधुबन छांडो। ले गयो काळ कलेजारे॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सबही बोल सजारे॥४॥

कोई कहियौ रे प्रभु आवन की

कोई कहियौ रे प्रभु आवन की,
आवनकी मनभावन की।

आप न आवै लिख नहिं भेजै ,
बाण पड़ी ललचावन की।

ए दोउ नैण कह्यो नहिं मानै,
नदियां बहै जैसे सावन की।

कहा करूं कछु नहिं बस मेरो,
पांख नहीं उड़ जावनकी।

मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे,
चेरी भै हूँ तेरे दांवन की।

कोई स्याम मनोहर ल्योरी

कोई स्याम मनोहर ल्योरी, सिर धरे मटकिया डोले।।टेक।।
दधि को नाँव बिसर गई ग्वालन, हरिल्यो हरिल्यो बोलै।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, चेरी भई बिन मोलै।
कृष्ण रूप छकी है ग्वालिन, औरहि औरै बोलै।।

कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो

कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो, रंग लाग्यो भ्रम भाग्यो ।।टेक।।
लोक कहैं मीराँ भई बाबरी भ्रम दूनी ने खाग्यो।
कोई कहै रंग लाग्यो।
मीराँ साधाँ में यूँ रम बैठी, ज्यूँ गुदड़ी में तागो।
सोने में सुहागो।
मीराँ लूती अपने भवन में, सतगुरू आप जगाग्यो।
ज्ञानी गुरू आप जगाग्यो।।

कुबजा ने जादु डारा

कुबजा ने जादु डारा।
मोहे लीयो शाम हमारारे॥
दिन नहीं चैन रैन नहीं निद्रा।
तलपतरे जीव हमरारे॥ १॥
निरमल नीर जमुनाजीको छांड्यो।
जाय पिवे जल खारारे॥ २॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी।
छोड्यायो पिहु प्यारा॥ ३॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे।
जीवन प्रान हमारा॥ ४॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।
बिरह समुदर सारा॥
कुबजा ने जादू डारारे॥५॥

पाठांतर
कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहै स्याम हमारा ।।टेक।।
झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा।
निरमल जल जमुना को छाँड़ो, जाय पिया जल खारा।
सीतल छाँय कदम की छोड़ी धूप सहा अति भारा।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, वाही प्राण पियारा।।

कैसी जादू डारी

कैसी जादू डारी। अब तूने कैशी जादु॥टेक॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडलकी छबि न्यारी॥१॥
वृंदाबन कुंजगलीनमों। लुटी गवालन सारी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलहारी॥३॥

कीत गयो जादु करके नो पीया

कीत गयो जादु करके नो पीया॥टेक॥
नंदनंदन पीया कपट जो कीनो। नीकल गयो छल करके॥१॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कबु ना मीले आंग भरके॥२॥
मीरा दासी शरण जो आई। चरणकमल चित्त धरके॥३॥

कालोकी रेन बिहारी

कालोकी रेन बिहारी। महाराज कोण बिलमायो॥टेक॥
काल गया ज्यां जाहो बिहारी। अही तोही कौन बुलायो॥१॥
कोनकी दासी काजल सार्यो। कोन तने रंग रमायो॥२॥
कंसकी दासी काजल सार्यो। उन मोहि रंग रमायो॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। कपटी कपट चलायो॥४॥

कान्हा बनसरी बजाय गिरधारी

कान्हा बनसरी बजाय गिरधारी। तोरि बनसरी लागी मोकों प्यारीं॥टेक॥
दहीं दुध बेचने जाती जमुना। कानानें घागरी फोरी॥१॥
सिरपर घट घटपर झारी। उसकूं उतार मुरारी॥२॥
सास बुरीरे ननंद हटेली। देवर देवे मोको गारी॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारी॥४॥

कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो

कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो। अमने रास रमाडीरे॥टेक॥
रास रमाडवानें वनमां तेड्या मोहन मुरली सुनावीरे॥१॥
माता जसोदा शाख पुरावे केशव छांट्या धोळीरे॥२॥
हमणां वेण समारी सुती प्रेहरी कसुंबळ चोळीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त चोरीरे॥४॥

कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग

कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग।।टेक।।
कालिन्दी दह नाग नक्यो काल फण फण निर्त अंत।
कूदां जल अन्तर णां डर्यौ को एक बाहु अणन्त।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, ब्रजवणितांरो कन्त।।

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