पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 6

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 6

घड़ी चेण णा आवड़ां, थें दरसण बिण मोय

घड़ी चेण णा आवड़ां, थें दरसण बिण मोय।
घाम न भावाँ नींद न आवाँ, बिरह सतावाँ मोय।
घायल री घूम फिरां म्हारो दरद ण जाण्या कोय।
प्राण गमायाँ झूरतां रे, नैण गुमायां रोय।
पंथ निहारां डगर मझारा, ऊभी मारग जोय।
मीरां रे प्रभु कब रे मिलोगां, थें मिल्यां सुख होय।।

गोविन्द सूँ प्रीत करत तब ही क्यूँ न हटकी

गोविन्द सूँ प्रीत करत तब ही क्यूँ न हटकी।।टेक।।
अब तो बात फैल गई, जैसे बीज बट की।
बीच को बिचार नाहीं, छाँय परी तट की।
अब चूकौ तो और नाहीं, जैसे कला नट की।।
जल के बुरी गाँठ परी, रसना गुन रटकी।
अब तो छुड़ाय हारी, बहुत बार झटकी।।
घर-घर में घोल मठोल, बानी घट-घट की।
सब ही कर सीस धरी लोक-लाज पटकी।।
मद की हस्ती समान, फिरत प्रेम लटकी।
दासी मीरा भक्ति बूँद, हिरदय बिच गटकी।।

गिरधर रूसणुं जी कौन गुनाह

गिरधर रूसणुं जी कौन गुनाह।।टेक।।
कछु इक ओगुण काढ़ो म्हाँ छै, म्हैं भी कानाँ सुणा।
मैं दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणाँ।
कांई बात सूं करवौ रूसणऊं, क्यां दुख पावौ छो मना।
किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणाँ।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, थाँरो हो नाँव गणाँ।।

पाठांतर
गिरधर रीसाणा कौन गुणाँ।।टेक।।
कछुक औगुण हम मैं काढ़ो, मैं भी कान सुणाँ।
मैं तो दासी थाराँ जनम जनम की, थें साहब सुगणा।
मीराँ कहे प्रभु गिरधरनागर, थारोई नाम भणा।।

क्या करूं मैं बनमें गई घर होती

क्या करूं मैं बनमें गई घर होती। तो शामकू मनाई लेती॥टेक॥
गोरी गोरी ब‍ईया हरी हरी चुडियां। झाला देके बुलालेती॥१॥
अपने शाम संग चौपट रमती। पासा डालके जीता लेती॥२॥
बडी बडी अखिया झीणा झीणा सुरमा। जोतसे जोत मिला लेती॥३॥
मीराबाई कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल लपटा लेती॥४॥

कोई देखोरे मैया

कोई देखोरे मैया। शामसुंदर मुरलीवाला॥टेक॥
जमुनाके तीर धेनु चरावत। दधी घट चोर चुरैया॥१॥
ब्रिंदाजीबनके कुंजगलीनमों। हमकू देत झुकैया॥२॥
ईत गोकुल उत मथुरा नगरी। पकरत मोरी भय्या॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बजैया॥४॥

कुंजबनमों गोपाल राधे

कुंजबनमों गोपाल राधे॥टेक॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे। नीरखत शाम तमाल॥१॥
ग्वालबाल रुचित चारु मंडला। वाजत बनसी रसाळ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनपर मन चिरकाल॥३॥

किन्ने देखा कन्हया प्यारा

किन्ने देखा कन्हया प्यारा की मुरलीवाला॥टेक॥
जमुनाके नीर गंवा चरावे। खांदे कंबरिया काला॥१॥
मोर मुकुट पितांबर शोभे। कुंडल झळकत हीरा॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल बलहारा॥३॥

कारे कारे सबसे बुरे ओधव प्यारे

कारे कारे सबसे बुरे ओधव प्यारे॥टेक॥
कारेको विश्वास न कीजे अतिसे भूल परे॥१॥
काली जात कुजात कहीजे। ताके संग उजरे॥२॥
श्याम रूप कियो भ्रमरो। फुलकी बास भरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। कारे संग बगरे॥४॥

कान्हा कानरीया पेहरीरे

कान्हा कानरीया पेहरीरे॥टेक॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। खेल खेलकी गत न्यारीरे॥१॥
खेल खेलते अकेले रहता। भक्तनकी भीड भारीरे॥२॥
बीखको प्यालो पीयो हमने। तुह्मारो बीख लहरीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरण कमल बलिहारीरे॥४॥

कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया

कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया।।टेक।।
बिन्द्रावन की कुँज गलिन में, गहे लीनो मेरो हाथ।
दध मेरो खायो मटकिया फोरी, लीनो भुज भर साथ।
लपट झपट मोरी गागर पटकी, साँवरे सलोने लोने गात।
कबहुँ न दान लियो मनमोहन, सदा गोकल आत जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, जनम जनम के नाथ।।

कठण थयां रे माधव मथुरां जाई

कठण थयां रे माधव मथुरां जाई। कागळ न लख्यो कटकोरे॥टेक॥
अहियाथकी हरी हवडां पधार्या। औद्धव साचे अटक्यारे॥१॥
अंगें सोबरणीया बावा पेर्या। शीर पितांबर पटकोरे॥२॥
गोकुळमां एक रास रच्यो छे। कहां न कुबड्या संग अतक्योरे॥३॥
कालीसी कुबजा ने आंगें छे कुबडी। ये शूं करी जाणे लटकोरे॥४॥
ये छे काळी ने ते छे। कुबडी रंगे रंग बाच्यो चटकोरे॥५॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। खोळामां घुंघट खटकोरे॥६॥

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