पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 4

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 4

अजब सलुनी प्यारी मृगया नैनों

अजब सलुनी प्यारी मृगया नैनों। तें मोहन वश कीधोरे॥टेक॥
गोकुळमां सौ बात करेरे बाला कां न कुबजे वश लीधोरे॥१॥
मनको सो करी ते लाल अंबाडी अंकुशे वश कीधोरे॥२॥
लवींग सोपारी ने पानना बीदला राधांसु रारुयो कीनोरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त दीनोरे॥४॥

अब तौ हरी नाम लौ लागी

अब तौ हरी नाम लौ लागी।।टेक।।
सब जगको यह माखनचोरा, नाम धर्‌यो बैरागी॥
कित छोड़ी वह मोहन मुरली, कित छोड़ी सब गोपी।
मूड़ मुड़ाइ डोरि कटि बांधी, माथे मोहन टोपी॥
मात जसोमति माखन-कारन, बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नांव॥
पीतांबर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा, रसना कृष्ण बसै॥

आओ मनमोहना जी जोऊं थांरी बाट

आओ मनमोहना जी जोऊं थांरी बाट।।टेक।।
खान पान मोहि नैक न भावै नैणन लगे कपाट॥
तुम आयां बिन सुख नहिं मेरे दिल में बहोत उचाट।
मीरा कहै मैं बई रावरी, छांड़ो नाहिं निराट॥

 

आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको

आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको।।टेक।।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्दजी को॥
निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को।
रतन सिंघासन आप बिराजैं, मुगट धर्‌यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरति राधिका, सबद सुनन मुरली को।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको॥

पाठांतर
आली म्हाँणे लागाँ बृन्द्रावण नीकाँ।।टेक।।
घर-घर तुलसी ठाकर पूजां, दरसण गोविन्द जी काँ।
निरमल नीर बह्या जमणाँ माँ, भोजण दूध दही काँ।
रतण सिंघासण आप बिराज्याँ, मुगुट धर्यां तुलसी काँ।
कुँजन-कुँजन फिर्या सांवरा, सबद सुण्या मुरली काँ।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, भजण बिणआ नर फीकाँ।।

ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी

ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी ।।टेक।।
तुम देखे बिन कलि न परति है, तलफि तलफि जिव जासी।
तेरे खातिर जोगण हूँगा करबत लूँगी कासी।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल की दासी।।

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