पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 35

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 35

होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ

होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ घर आँगणां णा सुहावाँ।।टेक।।
दीपाँ चोक पुरावाँ हेली, पिया परदेस सजावाँ।
सूनी सेजाँ व्याल बुझायाँ जागा रेण बितावाँ।
नींद णेणा णा आवाँ।
कब री ठाढ़ी म्हा मग जोवाँ निसदिन बिरह जगावाँ।
क्यासूं मणरी बिथा बतावाँ, हिवड़ो रहा अकुलावाँ।
पिया कब दरस दखावां।
दीखा णां कोई परम सनेही, म्हारो संदेसाँ लावाँ।
वा बिरियां कब कोसी म्हारी हँस पिय कंठ लगावाँ।
मीराँ होली गावाँ।।

हो गये श्याम दूइज के चन्दा

हो गये श्याम दूइज के चन्दा।।टेक।।
मधुबन जाइ भये मधुबनिया, हम पर डारो प्रेम को फन्दा।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, अब तो नेह परो कछु मन्दा।।

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।
घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।
जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय।
सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।
गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।
दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद सांवरिया होय।

पाठांतर
हेरी म्हां दरदे दिवाणी म्हारां दरद न जाण्याँ कोय।।टेक।।
घायल री गत घाइल जाण्यां, हिवड़ो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहरी जाणै, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मार्यां दर दर डोल्यां बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरां री प्रभु पीर मिटांगां जब बैद सांबरो होय।।

हे माई म्हाँको गिरधरलाल

हे माई म्हाँको गिरधरलाल ।।टेक।।
थाँरे चरणाँ की आनि करत हों, और न मणि लाल।
नात सगो परिवारो सारो, मन लागे मानो काल।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, छबि लखि भई निहाल।।

हारि आवदे खोसरी

हारि आवदे खोसरी। बुंद न भीजे मो सारी॥टेक॥
येक बरसत दुजी पवन चलत है। तिजी जमुना गहरी॥१॥
एक जोबन दुजी दहीकी मथीनया। तिजी हरि दे छे गारी॥२॥
ब्रज जशोदा राणी आपने लालकू। इन सुबहूमें हारी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। प्रभु चरणा पर वारी॥४॥

हरि मेरे जीवन प्राण अधार

हरि मेरे जीवन प्राण अधार।
और आसरो नांही तुम बिन, तीनू लोक मंझार।।

हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
आपबिना मोहि कछु न सुहावै निरख्यौ सब संसार।
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
मीरा कहै मैं दासि रावरी, दीज्यो मती बिसार।।
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।।
पाठांतर
हरि म्रा जीवन प्राण अधार ।।टेक।।
और आसिरो णा म्हारा थें बिण, तीनूं लोक मंझार।
थें बिण म्हाणे जग ण सुहावाँ, निरख्याँ पद संसार।
मीराँ रे प्रभु दासी रावली, लीज्यो णेक णिहार।।

हरिनाम बिना नर ऐसा है

हरिनाम बिना नर ऐसा है। दीपकबीन मंदिर जैसा है॥टेक॥
जैसे बिना पुरुखकी नारी है। जैसे पुत्रबिना मातारी है।
जलबिन सरोबर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥१॥
जैसे सशीविन रजनी सोई है। जैसे बिना लौकनी रसोई है।
घरधनी बिन घर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥२॥
ठुठर बिन वृक्ष बनाया है। जैसा सुम संचरी नाया है।
गिनका घर पूतेर जैसा है। हरिनाम बिना नर ऐसा है॥३॥
कहे हरिसे मिलना। जहां जन्ममरणकी नही कलना।
बिन गुरुका चेला जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥४॥

हमे कैशी घोर उतारो

हमे कैशी घोर उतारो। द्रग आंजन सबही धोडावे।
माथे तिलक बनावे पेहरो चोलावे॥१॥
हमारो कह्यो सुनो बिष लाग्यो। उनके जाय भवन रस चाख्यो।
उवासे हिलमिल रहना हासना बोलना॥२॥
जमुनाके तट धेनु चरावे। बन्सीमें कछु आचरज गावे।
मीठी राग सुनावे बोले बोलना॥३॥
हामारी प्रीत तुम संग लागी। लोकलाज कुलकी सब त्यागी।
मीराके प्रभु गिरिधारी बन बन डोलना॥४॥

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