पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 32

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 32

स्याम विणा सखि रह्या ण जावां

स्याम विणा सखि रह्या ण जावां।।टेक।।
तण मण जीवण प्रीतम वार्या, थारे रूप लुभावां।
खाण वाण म्हारो फीकां सो लागं नैणा रहां मुरझावां।
निस दिन जोवां बाट मुरारी, कबरो दरसण पावां।
बार बार थारी अरजां करसूं रैण गवां दिन जावां।
मीरा रे हरि थे मिलियाँ बिण तरस तरस जीया जावां।।

स्याम मिलण रे काज सखी

स्याम मिलण रे काज सखी, उर आरति जागी।।टेक।।
तलफ तलफ कल ना पड़ाँ विरहानल लागी।
निसदिन पंथ निहाराँ पिवरो, पलक ना पल भर लागी।
पीव पीव म्हाँ रटाँ रैण दिन लोक लाज कुल त्यागी।
बिरह भवंगम डस्याँ कलेजा माँ लहर हलाहल जागी।
मीराँ व्याकुल अति अकुलाणी स्याम उमंगा लागी।।

सूरत दीनानाथ से लगी तो

सूरत दीनानाथ से लगी तो तू समझ सुहागण सुरता नार॥
लगनी लहंगो पहर सुहागण, बीतो जाय बहार।
धन जोबन है पावणा रो, मिलै न दूजी बार॥
राम नाम को चुड़लो पहिरो, प्रेम को सुरमो सार।
नकबेसर हरि नाम की री, उतर चलोनी परलै पार॥
ऐसे बर को क्या बरूं, जो जनमें औ मर जाय।
वर वरिये इक सांवरो री, चुड़लो अमर होय जाय॥
मैं जान्यो हरि मैं ठग्यो री, हरि ठगि ले गयो मोय।
लख चौरासी मोरचा री, छिन में गेर्‌या छे बिगोय॥
सुरत चली जहां मैं चली री, कृष्ण नाम झणकार।
अविनासी की पोल मरजी मीरा करै छै पुकार॥

सांवलिया म्हारो छाय रह्या परदेश

सांवलिया म्हारो छाय रह्या परदेश।।टेक।।
म्हारा बिछड़या फेर न मिलिया भेज्या णा एक सन्नेस।
रटण आभरण भूखण छाड़्यां खोर कियां सिर केस।
भगवां भेख धर्यां थें कारण, डूढ्यां चार्यां देस।
मीरां रे प्रभु स्याम मिलण बिणआ जीवनि जनम अनेस।।

साँवरी सुरत मण रे बसी

साँवरी सुरत मण रे बसी ।।टेक।।
गिरधर ध्यान धराँ निसबासर, मण मोहण म्हारे बसी।
कहा कराँ कित जावाँ सजणी, म्हातो स्याम डसी।
मीराँ रे प्रभु कबरे मिलोगे, नित नव प्रीत रसी।।

सावण दे रह्या जोरा रे घर आयो

सावण दे रह्या जोरा रे घर आयो जी स्याम मोरा रे।।टेक।।
उमड़ घुमड़ चहुँदिस से आया, गरजत है घन घोरा, रे।
दादुर मोर पपीहा बोलै, कोयल, कर रही सोरा रे।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, ज्यों वारूँ सोही थोरा रे।।

सजन सुध ज्यूँ जाणे त्यूँ लीजै हो

सजन सुध ज्यूँ जाणे त्यूँ लीजै हो।।टेक।।
तुम बिन मोरे अवर न कोई, क्रिपा रावरी कीजै हो।
दिन नहिं भूख रैण नहिं निंदरा, यूँ तन पलपल छीजै हो।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, मिल बिछड़न मत कीजै हो।।

सखी, मेरी नींद नसानी हो

सखी, मेरी नींद नसानी हो।
पिवको पंथ निहारत सिगरी रैण बिहानी हो॥
सखिअन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो।
बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय ऐसी ठानी हो॥
अंग अंग व्याकुल भई मुख पिय पिय बानी हो।
अंतरबेदन बिरह की कोई पीर न जानी हो॥
ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछली जिमि पानी हो।
मीरा व्याकुल बिरहणी सुद बुध बिसरानी हो॥

पाठांतर
सखी म्हारी नींद नसानी हो।
पिय रो पंथ निहरात सब रैण बिहानी हो।।टेक।।
सखियन सब मिल सीख दयां मन एक न मानी हो।
बिन देख्यां कल ना पड़ां मन रोस णा ठानी हो।
अंग खीण व्याकुल भयाँ मुख पिय पिय वाणी हो।
अन्तर वेदन विरह री म्हारी पीड़ णा जाणी हो।
ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछरी ज्यूं पाणी हो।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, सुध बुध विसराणी हो।।

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