पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 26

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 26

श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो

श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो।
औरन सूँ खेलै धमार, म्हासूँ मुखहुँ न बोले हो॥
म्हारी गलियाँ ना फिरे वाके, आँगन डोलै हो।
म्हारी अँगुली ना छुए वाकी, बहियाँ मरोरै हो॥
म्हारो अँचरा ना छुए वाको, घूँघट खोलै हो।
‘मीरा’ को प्रभु साँवरो, रंग रसिया डोलै हो॥

शाम मुरली बजाई कुंजनमों

शाम मुरली बजाई कुंजनमों॥टेक॥
रामकली गुजरी गांधारी। लाल बिलावल भयरोमों॥१॥
मुरली सुनत मोरी सुदबुद खोई। भूल पडी घरदारोमों॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। वारी जाऊं तोरो चरननमों॥३॥

शाम बन्सीवाला कन्हैया

शाम बन्सीवाला कन्हैया। मैं ना बोलूं तुजसेरे॥टेक॥
घर मेरा दूर घगरी मोरी भारी। पतली कमर लचकायरे॥१॥
सास नंनदके लाजसे मरत हूं। हमसे करत बलजोरी॥२॥
मीरा तुमसो बिगरी। चरणकमलकी उपासीरे॥३॥

शाम बतावरे मुरलीवाला

शाम बतावरे मुरलीवाला॥टेक॥
मोर मुगुट पीताबंर शोभे। भाल तिलक गले मोहनमाला॥१॥
एक बन धुंडे सब बन धुंडे। काहां न पायो नंदलाला॥२॥
जोगन होऊंगी बैरागन होऊंगी। गले बीच वाऊंगी मृगछाला॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। माग लीयो प्रीयां प्रेमको माला॥४॥

शरणागतकी लाज

शरणागतकी लाज।तुमकू शणागतकी लाज॥टेक॥
नाना पातक चीर मेलाय।पांचालीके काज॥१॥
प्रतिज्ञा छांडी भीष्मके।आगे चक्रधर जदुराज॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।दीनबंधु महाराज॥३॥

राम सनेही साबरियो

राम सनेही साबरियो, म्हांरी नगरी में उतर्यो आय।।टेक।।
प्राण जाय पणि प्रीत न छांडूं रहीं चरण लपटाय।
सपत दीप की दे परकरमा, हरि हरी में रहौ समाय।
तीन लोक झोली में डारै, धरती ही कियो निपाय।
मीरां के प्रभु हरि अबिनासी, रहौ चरण लपटाय।।

राम बिन निंद न आवे

राम बिन निंद न आवे। बिरह सतावे प्रेमकी आच ठुरावे॥टेक॥
पियाकी जोतबिन मो दर आंधारो दीपक कदायन आवे।
पियाजीबिना मो सेज न आलुनी जाननरे ए बिहावे।
कबु घर आवे घर आवे॥१॥
दादर मोर पपीया बोले कोयल सबद सुनावे।
गुमट घटा ओल रहगई दमक चमक दुरावे। नैन भर आवें॥२॥
काहां करूं कितना उसखेरू बदन कोई न बनावे।
बिरह नाग मेरि काया डसी हो। लहर लहर जीव जावे जडी घस लावे॥३॥
कहोरी सखी सहली सजनी पियाजीनें आने मिलावे।
मीराके प्रभु कबरी मिलेगे मोहनमो मन भावे। कबहूं हस हस बतलावे॥४॥

राणा जी म्हाँने या बदनामी लागे मीठी

राणा जी म्हाँने या बदनामी लागे मीठी।।टेक।।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूँगी चाल अपूठी।
साँकड़ली सेर्यां जन मिलिया कर्यूं कर फिरूँ अपूठी।
सत सँगति सा ग्यान सुणैछी तुरजन लोगाँ ने दीठी।
मीराँ रो प्रभु गिरधरनागर, दुरजन जलो जा अंगीठी।।

 

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