पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 27

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 27

लेताँ लेताँ राम नाम रे

लेताँ लेताँ राम नाम रे, लोकड़ियाँ तो लाजाँ मरे छै।।टेक।।
हरि मंदरि जाताँ पांवलिया रे दूखे, फिर आवे सारो गाम रे।
झगड़ो थाँय त्याँ दौड़ी न जाय रे मूको रे घर ना काम रे।
भाड भवैया गणिका नित करताँ, बेसी रहें चारे जाम रे।
मीराँना प्रभु गिरधरनागर चरण कमल चित हाम रे।।

लागी सोही जाणै, कठण लगन दी पीर

लागी सोही जाणै, कठण लगन दी पीर।।टेक।।
विपत पड्याँ कोई निकटि न आवै, सुख में, सब को सीर।
बाहरि घाव कछू नहिं दीसै, रोम रोम दी पीर।
जन मीराँ गिरधर के उपर, सदकै करूँ सरीर।।

लागी मोहिं नाम-खुमारी हो

लागी मोहिं नाम-खुमारी हो॥
रिमझिम बरसै मेहड़ा भीजै तन सारी हो।
चहुंदिस दमकै दामणी गरजै घन भारी हो॥
सतगुर भेद बताया खोली भरम-किंवारी हो।
सब घट दीसै आतमा सबहीसूं न्यारी हो॥
दीपग जोऊं ग्यानका चढूं अगम अटारी हो।
मीरा दासी रामकी इमरत बलिहारी हो॥

लक्ष्मण धीरे चलो मैं हारी

लक्ष्मण धीरे चलो मैं हारी॥टेक॥
रामलक्ष्मण दोनों भीतर। बीचमें सीता प्यारी॥१॥
चलत चलत मोहे छाली पड गये। तुम जीते मैं हारी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलिहारी॥३॥

रूप देखश अटकी, तेरा रूप देख अटकी

रूप देखश अटकी, तेरा रूप देख अटकी ।।टेक।।
देह तें विदेह भई, ढुरि परि सिर भटकी।
माता-पिता भ्रात बंधु, सब हो मिल अटकी।
हिरदा ते टरत नाहिं मुरति नागर नट की।
प्रगट भयो पूरन नेह लोक जाने भटकी।
मीराँ प्रभु गिरिधर बिन, कौन लहे घटकी।।

लटपटी पेचा बांधा राज

लटपटी पेचा बांधा राज॥टेक॥
सास बुरी घर ननंद हाटेली। तुमसे आठे कियो काज॥१॥
निसीदन मोहिके कलन परत है। बनसीनें सार्‍यो काज॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधन नागर। चरन कमल सिरताज॥३॥

राम-नाम-रस पीजै

राम-नाम-रस पीजै।
मनवा! राम-नाम-रस पीजै।
तजि कुसंग सतसंग बैठि नित, हरि-चर्चा सुणि लीजै।
काम क्रोध मद मोह लोभ कूं, चित से बाहय दीजै।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ता के रंग में भीजै।

राधे तोरे नयनमों जदुबीर

राधे तोरे नयनमों जदुबीर॥टेक॥
आदी आदी रातमों बाल चमके। झीरमीर बरसत नीर॥१॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडल झलकत हीर॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल शीर॥३॥

राणाजी थें जहर दियो म्हे जाणी

राणाजी थें जहर दियो म्हे जाणी।।टेक।।
जैसे कञ्चन दहत अगनि से, निकसत बाराबाणी।
लोकलाज कुल काण जगत की, दृढ बहाय जस वाणी।
अपणे घर का परदा करले, में अबला बौराणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक ग्यो सनकाणी।
सब संतत पर तन मन वारो, चरण केवल लपटाणी।
मीराँ की प्रभु राखि लई है दासी आपणी जाणी।।

Leave a Reply