पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 22

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 22

मत डारो पिचकारी

मत डारो पिचकारी। मैं सगरी भिजगई सारी॥टेक॥
जीन डारे सो सनमुख रहायो। नहीं तो मैं देउंगी गारी॥१॥
भर पिचकरी मेरे मुखपर डारी। भीजगई तन सारी॥२॥
लाल गुलाल उडावन लागे। मैं तो मनमें बिचारी॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारी४॥

मन अटकी मेरे दिल अटकी

मन अटकी मेरे दिल अटकी। हो मुगुटकी लटक मन अटकी॥टेक॥
माथे मुकुट कोर चंदनकी। शोभा है पीरे पटकी॥१॥
शंख चक्र गदा पद्म बिराजे। गुंजमाल मेरे है अटकी॥२॥
अंतर ध्यान भये गोपीयनमें। सुध न रही जमूना तटकी॥३॥
पात पात ब्रिंदाबन धुंडे। कुंज कुंज राधे भटकी॥४॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। सुरत रही बनशी बटकी॥५॥
फुलनके जामा कदमकी छैया। गोपीयनकी मटुकी पटकी॥६॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। जानत हो सबके घटकी॥७॥

मन मोहन दिलका प्यारा

मन मोहन दिलका प्यारा॥टेक॥
माता जसोदा पालना हलावे। हातमें लेकर दोरा॥१॥
कबसे अंगनमों खडी है राधा। देखे किसनका चेहरा॥२॥
मोर मुगुट पीतांबर शोभे। गळा मोतनका गजरा॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल बलहारी॥४॥

माई तेरो काना कोन गुनकारो

माई तेरो काना कोन गुनकारो। जबही देखूं तबही द्वारहि ठारो॥टेक॥
गोरी बावो नंद गोरी जशू मैया। गोरो बलिभद्र बंधु तिहारे॥१॥
कारो करो मतकर ग्वालनी। ये कारो सब ब्रजको उज्जारो॥२॥
जमुनाके नीरे तीरे धेनु चराबे। मधुरी बन्सी बजावत वारो॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल मोहि लागत प्यारो॥४॥

मेरी गेंद चुराई

मेरी गेंद चुराई। ग्वालनारे॥टेक॥
आबहि आणपेरे तोरे आंगणा। आंगया बीच छुपाई॥१॥
ग्वाल बाल सब मिलकर जाये। जगरथ झोंका आई॥२॥
साच कन्हैया झूठ मत बोले। घट रही चतुराई॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलजाई॥४॥

मेरी लाज तुम रख भैया

मेरी लाज तुम रख भैया। नंदजीके कुंवर कनैया॥टेक॥
बेस प्यारे काली नागनाथी। फेणपर नृत्य करैया॥१॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। मुखपर मुरली बजैया॥२॥
मोर मुगुट पीतांबर शोभे। कान कुंडल झलकैया॥३॥
ब्रिंदावनके कुंज गलिनमें नाचत है दो भैया॥४॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल लपटैया॥५॥

म्हा मोहणरो रूप लुभाणी

म्हा मोहणरो रूप लुभाणी।।टेक।।
सुन्दर बदन कमल दल लोचण, बाँका चितवण णेण समाणी।
जमणा किणारे कान्हे धेनु चरावाँ, बंसी बजावाँ मीठाँ वाणी।
तन मन धन गिरवर पर वाराँ, चरण कँवल मीराँ विलमाणी।।

म्हारे घर रमतो ही जोगीय तूं आँव

म्हारे घर रमतो ही जोगीय तूं आँव।।टेक।।
कानां बिच कुंडल गले बिच सेली, अंग भभूत रमाय।
तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है ग्रिह अँगणो न सुहाय।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, दरसण द्यौन मोकूँ आय।।

म्हाँ गिरधर आगाँ नाच्याँ री

म्हाँ गिरधर आगाँ नाच्याँ री ।।टेक।।
णाच णाच म्हाँ रसिक रिझावाँ, प्रीत पुरांतन जांच्यां री।
स्याम प्रीत री बाँधि घूघर्यां मोहण म्हारो साँच्याँ री।
लोक लाज कुलरा मरज्यादाँ जगमाँ णेकणा राख्याँ री।
प्रीतम पर छब णा बिसरवाँ, मीराँ हरि रँग राच्याँरी ।।

म्हांरी बात जगत सूं छानी

म्हांरी बात जगत सूं छानी, साधाँ सूं नही छानी री ।।टेक।।
साधू मात-पिता कुल मेरे, साधू निरमल ग्यानी री।
राणा ने समझायो बाई, ऊदां मैं तो एक न मानी री।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, सन्तन हाथ बिकानी री।।

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