पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 23

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 23

मतवारो बादर आए रे

मतवारो बादर आए रे, हरि को सनेसो कबहुँ न लाये रे।।टेक।।
दादर मोर पपइया बोलै, कोयल सबद सुणाये रे।
(इक) कारी अँधियारी बिजली चमकै, बिरहणि अति डरपाये रे।
(इक) गाजै बाजै पवन मधुरिमा, मेहा अति झड़ लाये रे।
(इक) कारी नाग बिरह अति जारी, मीराँ मन हरि भाये रे।।

मन केरो जेवो चंद्र छे

मन केरो जेवो चंद्र छे। रास रमे नंद लालो रे॥टेक॥
नटवर बेश धर्यो नंद लाले। सौ ओघाने चालोरे॥१॥
गानतान वाजिंत्र बाजे। नाचे जशोदानो काळोरे॥२॥
सोळा सहस्त्र अष्ट पटराणी। बच्चे रह्यो मारो बहालोरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। रणछोडे दिसे छोगळोरे॥४॥

माई मेरो मोहनमें मन हारूं

माई मेरो मोहनमें मन हारूं॥टेक॥
कांह करुं कीत जाऊं सजनी। प्रान पुरससु बरयो॥१॥
हूं जल भरने जातथी सजनी। कलस माथे धरयो॥२॥
सावरीसी कीसोर मूरत। मुरलीमें कछु टोनो करयो॥३॥
लोकलाज बिसार डारी। तबही कारज सरयो॥४॥
दास मीरा लाल गिरिधर। छान ये बर बरयो॥५॥

माई म्हाणो सुपणा मां परण्यां दीनानाथ

माई म्हाणो सुपणा मां परण्यां दीनानाथ।
छप्पण कोटां जणां पधारयां दूल्हो सिरी व्रजनाथ।
सुपणा मां तोरण बेंध्यारी सुपणामां गह्या हाथ।
सुपणां मां म्हारे परण गया पायां अचल सुहाग।
मीरां रो गिरधर मिल्यारी, पुरब जणम रो भाग।।

मुरलिया बाजा जमणा तीर।।टेक।।

मुरलिया बाजा जमणा तीर।।टेक।।
मुरली म्हारो मण हर लीन्हो, चित्त धराँ णा धीर।
श्याम कण्हैया स्याम करमयां, स्याम जमणरो नीर।
धुण मुरली शुण सुध बुध बिसरां, जर जर म्हारो सरीर।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, बेग हर्यां, म्हा पीर।।

मेरे तो आज साचे राखे

मेरे तो आज साचे राखे हरी साचे। सुदामा अति सुख पायो दरिद्र दूर करी॥१॥
साचे लोधि कहे हरी हाथ बंधाये। मारखाधी ते खरी॥२॥
साच बिना प्रभु स्वप्नामें न आवे। मरो तप तपस्या करी॥३॥
मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर। बल जाऊं गडी गडीरे॥४॥

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छांड़ि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई॥
दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥

पाठांतर
म्हराँ री गिरधर गोपाल दूसरआं णा कूयाँ।
दूसराँ णाँ कूयाँ साथाँ सकल लोक जूयाँ।।टेक।।
भाया छाँणयाँ, बन्धा छाँड्याँ सगाँ भूयां।
साधाँ ढिग बैछ बैठ, लोक लाज खूयाँ।
भगत देख्यां राजी ह्याँ, जगत देख्यां रूयाँ।
दूध मथ धृत काढ़ लयाँ डार दया छूयाँ।
राणा विषरो प्यालो भेज्याँ, पीय मगण हूयाँ।
मीरां री लगण लग्याँ होणा हो जो हूयाँ।।

मैं गिरधर के घर जाऊँ

मैं गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ।।
रैण पड़ै तबही उठ जाऊँ भोर भये उठिआऊँ।
रैन दिना वाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं ताहि रिझाऊँ।।
जो पहिरावै सोई पहिरूं जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उणकी प्रीति पुराणी उण बिन पल न रहाऊँ।
जहाँ बैठावें तितही बैठूं बेचै तो बिक जाऊँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार बार बलि जाऊँ।।

पाठांतर
में तो गिरधर के घर जाऊँ।।टेक।।
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ।
रैण पड़ै तब ही उछा जाऊँ भोर गये उछि आऊँ।
रैणदिना वाके सँग खेलूं, ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊँ।
जो पहिरावै होई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उणकी प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ।
जहाँ बैठावैं तितही बैठै, बेचे तो बिक जाऊँ।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, बार बार बलि जाऊँ।।

मैं तो सांवरे के रंग राची

मैं तो सांवरे के रंग राची।
साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची।।
गई कुमति, लई साधुकी संगति, भगत, रूप भै सांची।
गाय गाय हरिके गुण निस दिन, कालब्यालसूँ बांची।।
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची।
मीरा श्रीगिरधरन लालसूँ, भगति रसीली जांची।।

पाठांतर
माई साँवरे रंग राँची।।टेक।।
साज सिंगार बाँध पग घूंघर, लोकलाज तज नाँची।
गयाँ कुमत लयाँ साधाँ, सँगत, श्याम प्रीत जग साँची।
गायाँ गायाँ हरि गुण निसदिन, काल ब्याल री बाँची।
श्याम बिणआ जग खाराँ लागाँ जगरी बाताँ काँची।
मीरां सिरी गिरधर नट नागर, भगति रसीली जाँची।।

मैं बिरहणि बैठी जागूं

मैं बिरहणि बैठी जागूं जगत सब सोवे री आली॥
बिरहणी बैठी रंगमहल में, मोतियन की लड़ पोवै|
इक बिहरणि हम ऐसी देखी, अंसुवन की माला पोवै॥
तारा गिण गिण रैण बिहानी , सुख की घड़ी कब आवै।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, जब मोहि दरस दिखावै॥

म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा

म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।
तन मन धन सब भेंट धरूंगी भजन करूंगी तुम्हारा।
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।
तुम गुणवंत सुसाहिब कहिये मोमें औगुण सारा।।
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।
मैं निगुणी कछु गुण नहिं जानूं तुम सा बगसणहारा।।
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।
मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे तुम बिन नैण दुखारा।।
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।

पाठांतर
म्हाँरे घर आज्यो प्रियतम प्यारा, तुम बिन सब जग खारा।।टेक।।
तन मन धन सब भेंट करूँ, ओ भजन करूँ मैं थारा।
तुम गुणवंत बड़े गुणसागर, मैं हूँ जी औगणहारा।
मैं निगुणी गुण एकौ नाहीं तुम हो बगसण हारा।
मीराँ कहे प्रभु कबहि मिलौगे, थाँ बिन नैण दुष्यारा।।

म्हां गिरधर रंग राती

म्हां गिरधर रंग राती, सैयां म्हां ।।टेक।।
पंचरंग चोला पहर्या सखी म्हां, झिरमिट खेलण जाती।
वां झरमिट मां मिल्यो सांवरो, देख्यां तण मण राती।
जिणरो पिया परदेस बस्यांरी लिख लिख भेज्यां पाती।
म्हारां पियां म्हारे हीयडे लिख लिख भेज्यां पाती।
म्हारा पिया म्हारी हीयडे बसतां णा आवां णा जाती।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर मग जोवां दिण राती।।

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